Wednesday, February 12, 2020

क़्वांटम 'मैं'



घर के अंदर आग जल रही है
भरी हुयी केतली उबल रही है
केतली में पानी है
पानी में उठते बुलबुले
बुलबुलों के अंदर हवा
मैं फिर से शून्यता में खो गया !

बुलबुलों के नीचे पानी उबल रहा है
करोड़ों जिंदगियाँ हैं !
जीवन ऐसे ही चल रहा है
पानी में देखा तो मैं ही नजर आया
चम्मच उसमे डाली तो खुद को ही हिलाया
तो क्या था पानी
जब सब मैं ही हूँ  ,
तो बाकी केवल भोथरी कहानी ?
ख़ुद को ढूंढता मैं
यहाँ भी हूँ, वहाँ भी
सुपरइंपोज़्ड और इंटेंगल्ड !

नीचे जल रही है आग
नीली भी है , पीली भी
लाल भी हो जाती है कभी कभी मेरी तरह
जब तापमान ज्यादा होता है
राजा से हुनरमंद प्यादा होता है
और तब भी अगर मैं छू के
खींच लूँ अपने हाथ
तो जलूँगा नहीं जलाऊंगा !
पर जो दिया आग का साथ
तो आग ही बन जाऊँगा
अजीब दुविधा है
तप जाऊं ?  बन जाऊं ? बिखर जाऊं ?
इस क्वाज़ी स्टेट में कैसे निखर जाऊँ !

केतली का ढक्कन उठने लगा है
हवा ठोस को उठा रही है
कभी कभी होता है जिंदगी में ऐसा
इसलिये मैं हवा को कम नहीं आँकता
और न ही आंकना चाहिये ढ़क्कन को
जो आज दबा हुआ है कल उठेगा
और उखाड़ फेंकेगा सबको
भले ही वो हवा हो और तुम ठोस
सिफ़र ही अक्सर उड़ाता है होश
और माना उड़ गया वो हवा में
हवा को हवा से मिलाता ,
अट्टहास करता गर्जना सुनाता
निर्गुण - निराकरार - निर्भय शून्य !

पानी के बाहर केतली कंपकपा रही है
काँप तो मैं भी रहा हूँ
सर्दी  भी है और गर्मी भी
फिर और ध्यान से देखा तो
धातु नजर आयी , अणु दिखे
परमाणु दिखे ,
अब इलेक्ट्रान , प्रोटोन दिख रहे हैं
और अंदर देखता हूँ तो कुछ नहीं दिखता है
कुछ है तो सही पर बनता बिगड़ता है
पहचान करना मुश्किल है
बिलकुल मेरी तरह !
तो क्या मैं क़्वांटम बन चुका हूँ ?

Monday, November 18, 2019

मैं वही हूँ



मैं वही हूँ ...
माँ की बुनी स्वेटर में गुंथा 
भाई की रफ़ू कमीज में सज़ा 
यार की अंगरेजी की टीशर्ट में सना
जिसमें लिखा न उससे न मुझसे बना !

मैं वही हूँ .. जिसके घर में 
मेहमानों के लिये अलग बिस्कुट निकलते हैं
नये टीवी के परदे बड़ी देर में खुलते हैं 
मिठाई इंसानो से पहले खाते हैं गणेश जी
पुरानी जीन्स के धागे पहले दरी फिर पोछे में मिलते हैं !

मैं वही हूँ ... 
इम्तिहान से पहले दही खाने वाला
सीट घेरने को रुमाल बिछाने वाला 
वन टिप आउट जैसे नियम बनाने वाला
कटी पतंग को उठा जोड़ फिर उड़ाने वाला

मैं वही हूँ ... 
सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने वाला
अपनी सैलरी को सीटीसी में बताने वाला 
लड़कियों से नजरें चुराने वाला 
बस बातों में नौकरी छोड़ जाने वाला 

मैं वही हूँ.....
शादाब के घर सेंवइयाँ खाता हूं 
गुरचरण को पंजाबी गाने में नचाता हूँ
क्रिस की अंग्रेजी की कॉपी करता हूँ कभी
कभी भूल कर इन सबको रंग लगाता हूँ

एक बात जो मुझे भारतीय बनाती है 
एक बात जो जिंदगी मेरी सजाती है 
प्रेम बहुत है मुझमें बस जेब से थोड़ा कड़का हूँ !
मैं वही आपकी गली के पीछे वाला ...
मध्यमवर्गीय भारतीय लड़का हूँ

Saturday, November 9, 2019

जिंदगी













पत्थर बनाने की कोशिश बहुत की ज़ालिम ने
मैं दरिया के पास था ,
 बस पिघल गया !

यूँ तो रोक लेता था खुद को मारकर हर शाम
वो शाम गुलाबी थी ,
 मन मचल गया !

मुझे देवता बनाने का शौक था अय्यारों को
महफ़िल सजी रह गयी ,
मैं निकल गया !

मैं चट्टानों के मानिंद खड़ा रहा तूफानों में
किसी की चुनरी लहरायी ,
 बस बिखर गया !

तारीफों के बोझ में दबा हुआ जिस्म मेरा 
किसी ने गाली दी ,
यूँ ही निखर गया |

चलता रहा अंधेरों में बेख़ौफ़ गाते हुये
उस गली में बहुत उजाला था,
 मैं सिहर गया |

हथियारों के साथ चलता रहा भीड़ में
मुझे काज़ी बना दिया
मैं सुधर गया |

लड़ पड़े थे लाश को लेकर मज़हब दोनों
वो कबीरा था
पता नहीं किधर गया |

दस रास्तों में बस एक रास्ता अनजान था
मुझे खुद को ढूँढना था
मैं उधर गया |

Sunday, April 28, 2019

आम

चलो आम खाते हैं 
मीठे मीठे आम चुस्कियों से भरे
मुझको तुमको ताकते खड़े खड़े
लेकर एक झोला हंसिया कंटीला सा 
तोड़ लाते हैं
चलो आम खाते हैं !

डर क्यूँ रहे हो ?
मिट्टी में ज़हर थोड़ी भरा है 
जमीन सूख रही तो क्या 
आम देखो बिल्कुल हरा है !
मिट्टी में थोड़ा सा पानी छिड़क कर 
पैरों से दबाते हैं
चलो आम खाते हैं !

ये बाग किसका है हमें नही पता 
अब भूख लग आयी तो हमारी क्या खता ?
वैसे भी सुना है मालिक इसका बेदम है
उसके बाग में क्या , 
उसके तो घर में भी पानी कम है !
थोड़ी दूर ही हरा मैदान है पानी से लबालब
रविवार है उसे देख आते हैं 
चलो आम खाते हैं !

ये आम पीला है कि हरा है ?
कोई कह रहा है अंदर केसरी रंग भरा है !
ऐसा करते हैं कि रंगों को अलग कर देते हैं 
तुम पीला ले लो हम हरा ले लेते हैं 
देखते हैं कि किसका आम ज्यादा खट्टा है
किसमें चीनी है किसमें मट्ठा है ?
खट्टे आम का हम क्या करेंगे ?
इकट्ठा करो विदेश भेज आते हैं
चलो आम खाते हैं !

सोच रहे हैं आमरस पी लिया जाये 
इतनी गरमी है 
थोड़ा जी भर के जी लिया जाये
पर आमरस बनाने आयेगा कौन ?
आ भी गया तो आमरस बनायेगा कौन ?
इस गाँव के सभी लोग नाकारा हैं 
इनको मशीनें दी थी पिछले साल 
लगता है मशीनें ही आवारा हैं 
छोड़ो साहब थोड़े पैसे बचा जाते हैं 
चलो आम खाते हैं !

ओह आम में कीड़ा लग गया है !
पिछले साल तो नई गुठलियां डाली थी 
ये पेड़ की डाली तो चमकने वाली थी !
पता नहीं क्या हुआ ..
पास की छोटी घास मर गयी है 
नया मिनरल वाटर भी तो आया था
शायद उससे डर गयी है !
एक दो डाली तो बची हैं चकाचक
थोड़ा आराम फरमाते हैं 
चलो आम खाते हैं 

सुना यहाँ कल रात को चोरी होने वाली थी ?
हमने भी निशाना लगा के गुलेल मारी थी
पर अंधेरा था पता नही लगी न लगी 
चिड़िया मगर इस पेड़ पर देख के ये सब 
रात भर जगी !
चिड़िया तो भोली है 
इनकी भी टोली है 
इनको गुलेल दिखा लाते हैं
चलो आम खाते हैं !

शायद ये आम सड़ गया है 
पानी , मिट्टी , खाद , धूप कुछ न मिला 
हम तो मगर आज़ाद हैं हमे क्या गिला 
कीड़े लग गये तो लगने दो 
भौंरे जग गये तो जगने दो
रसहीन हो जाने दो इस आम को
भूखा मरने दो तमाम को
हमें चिंता नहीं 
हमारे आम बिदेशों से आते हैं
चलो आम खाते हैं !

Sunday, February 10, 2019

चीख़

चुप रहने की कोशिश है हर तरफ़ 
भीड़ पीछे हट रही है 
वो अकेला आगे बढ़ रहा है
उसकी जीभ कट रही है 

हामी भरने की क़वायद में 
इंसान गायब हो रहे हैं 
कंकालों से भरा है तालाब
मेढक साहब हो रहे हैं 

सुबह सवेरे चल पड़ती है मशीन 
हर पुर्जा जोरदार आवाज करता है 
आवाज़ शायद सुन ले खरीदने वाला
सोचकर वो हर रात मरता है 

अकेलेपन से डरता है खौफजदा हो 
भीड़ के साथ दौड़ने लगता है 
दोनों हाथों से पकड़ कर हड्डी रीढ़ की
पूरी शिद्दत से मोड़ने लगता है 

पिघल जाता है लोहा लम्हों में 
ढलकर औजार बन जाता है 
काट देता है दूसरे लोहे को 
बेरहम हथियार बन जाता है 

बेइंतहां डर को सीने में लिये 
सिमट कर सोने लगा है 
हंसता मुस्कुराता दिन बिताता 
अंधेरों में रोने लगा है 

जीभ की परवाह हो गयी उसे 
जिगर की खबर नहीं रही है 
वैसे भी इस उत्तराधुनिक युग मे
ये भी सही है , वो भी सही है 

भूल गया कि केवल आँखे भी 
काफ़ी हैं जी भर बोलने के लिये
भूल गया कि केवल साँसें भी 
काफी हैं किसी के डोलने के लिये 

भूल गया कि आवाज उठाने के लिये
दूसरे पाले में झपट्टा मारना जरूरी है
जीत की गुंजाइश कहीं कभी बाकी रहे 
इसलिये बेख़ौफ़ हो हारना जरूरी है 

याद उसको आ गया जो ये नज़ारा 
टूट के चमकेगा फ़िर से वो सितारा
जीभ लंबी हो के रस्सी बन सकेगी 
फांद बन जायेगा कोमल ये नजारा
थरथरा जायेंगे हुक्मरानों के घर 
साथ उसके तुमने गर जो दहाड़ा 
एक उसकी लाश पर ही बन सकेगा 
हर पहर आज़ाद बागी घर तुम्हारा 
हर पहर आज़ाद बागी घर तुम्हारा

Tuesday, March 20, 2018

किरदार

















मुझे जानने की ख्वाहिश बहुतों ने की
उनको पता नहीं था ..
मैं किरदार में हूँ !

मेरा किरदार अनोखा है
खुद से जुदा
खुद पर फ़िदा
देखता सबको
देखता ख़ुद को !
और हंस देता बेमतलब सा 
बेमतलब की बातों पर |
हंसाता रुलाता छिपाता सजाता
मेरा किरदार वादे निभाता
कुछ को समझ आता
कुछ को खटक जाता !
सुनकर ख़ामोश सोचता
मैं किरदार में हूँ !

कुछ चेहरे हैं , कुछ हैं मुखौटे
सिक्के चमक रहे हैं खोटे खोटे
वो भी तो किरदार हैं
वो भी असरदार हैं
फिर लड़ाई किरदारों की है ?
या मेरी तुम्हारी !
किरदार जान नहीं पायेंगे
पहचान नहीं पायेंगे
कोशिश तो करेंगे
शायद पहचान भी लें
पर मान नहीं पायेंगे !
मैं भी क्यूँ मानूँ ?
मैं तो किरदार में हूँ !

मेरा प्रेम भी किरदारों वाला है
तुमने भी तो शौक़ पाला है ?
सपने जिंदगी को मात दे रहे हैं
किरदार आग को आँच दे रहे हैं
डर क्यूँ रहे हो ?
तुम्हारी भी तो केंचुली है !
किरदारों की शोख़ी
विरासत में मिली है |
ये देख रहे हो न समाज !
इसका भी किरदार है
कभी मंदिर है कभी मस्जिद है
और कभी लुटता बाजार है !
तो आओ कुछ खरीदें यहाँ से
प्रेम , द्वेष , दया , हिंसा
सब मिलता है यहाँ |
कीमत बदल जाती है पर
किरदार देखकर !
तो बदल लेना तुम भी किरदार
दुकान देखकर !
मैंने तो मुफ्त में लिया है सब कुछ
मैं तो किरदार में हूँ |

कभी कभी जब खामोश सोता हूँ
तो अपने किरदार में नहीं होता हूँ
देख नहीं पाता खुद को तब !
तुम भी नहीं देख पाओगे
कितने शीशे लाओगे ?
आदमी नंगा होता है
अपने किरदार के बिना !
पता है तुम्हें
संभल नहीं पाओगे |
तो अपने किरदार में रहो
आँखे बंद करो
और कहीं दूर तक बहो
जहाँ एक गाँव नया है
और वहाँ भी हवा चल रही है 
नये नये किरदारों की !
मुझे ढूँढ रहे हो ?
नहीं मिलूंगा !
मैं किरदार में हूँ  |



Monday, January 16, 2017

सभ्यता और समय 















समय की चाल पर खेलता
खंडहरों का हुजूम
और खंडहर हो जाता है
देखता अगर खुद को आईने में
बेसबर हो जाता है !

अंतहीन जीवन की कल्पना
स्वयंभू का अस्तित्व खोजता
मानव गढ़ता है राजमहल
होती है चहल पहल
चंद पलों की ...
और पल अगला निगल जाता है
पुराने पल को !
ठिठकती सभ्यतायें देखती
इस सतत छल को !

अदना सा मानव देखता
खुद को विजयी होते
सागर , पर्वत , व्योम
कितने छोटे लगते !
लेकिन भान नहीं है
धरती के गर्भ का ?
या फिर भान अधिक है
स्वयं के दर्प का ?
लावा निकलता कभी गर्भ से
कभी अपने अंदर छुपे दर्प से
और लुहलुहान होकर आखिर
बदल जाती है सभ्यता !
जिसे देखने आती नयी सभ्यता
अपना नया दर्प लेके !

ये पहिया चलता जाता है
घूम कर फिर वहीँ वहीँ आता है
बीच में कुछ अस्तित्वहीन धूलि कण
कर देते हैं अपने काल्पनिक युग का निर्माण
जिसे अगले चक्र में पहिये के नीचे आना है
जिसे अपना वजूद खुद ही मिटाना है !!


Sunday, May 15, 2016

शिक्षक शिक्षकों से ....


मैं शिक्षक हूँ मैं शिक्षा की कुछ बात बताने आया हूँ
मैं अध्यापक का नया नवेला अर्थ सुनाने आया हूँ ।

मेरी छोटी सी विनती है कि शिक्षा को समझे बुझेँ
मेरा अपना जो अनुभव है , मैं उसे साथ में लाया हूँ ।

शिक्षा क्या है ?
चंद किताबें !
जिनमे बस कुछ अक्षर होते
और कुछ मनमानी सी बातें ?
यही अगर बस शिक्षा है तो
शिक्षक का कोई मोल नहीं
उसकी अपनी कोई सोच नहीं
उसके अपने कोई बोल नहीं !

शिक्षा का बस मर्म यही है
सही गलत का भेद सिखाओ
रोबोट किताबी नहीं चाहिये
एक अच्छा इंसान बनाओ ।

कौतुहल है बच्चों में तो
तुम सबसे अच्छे अध्यापक हो
प्रश्न वहाँ से जितने आयें
उतना तुम मुस्काते जाओ
क्यूंकि कौतूहल में ही तो
नये विश्व का राज छुपा है
बच्चों की विस्मित आँखों में
ऊँचा उड़ता सा बाज़ छुपा है ।

उस बाज़ को हमें उड़ाना है
उसके पंखो की ताकत से
आसमान ये संवरेगा
उसकी आँखों की ताकत से
आसमान ये देखेगा ..
एक नया जमाना
नया तराना
दुनिया का
जिसके निर्माता शिक्षक हैं ।

शिक्षक जब शिक्षक न होकर
दोस्त बने इन बच्चों के
तो समझूंगा कि तुमने
शिक्षा को पूरा समझा है
और पूरा ही समझाया है
इन प्यारे प्यारे बच्चों को ।

और केवल बस पढ़ाते रहना
नहीं है पूरा  काम हमारा
प्रश्न पूछना अपने से   ...
हम कितना सीखे हैं हर दिन
कितना और सीखना है ?
कितनी मेहनत करनी है ?
कितना और सींचना है ?
तब जाके इन प्यारे पौधों
को पानी दे पाओगे
इन्हे सींचकर अपने श्रम से
हरा भरा कर पाओगे
नहीं तो फिर ये सूखेंगे
और तुम भी मुरझाओगे ।

शिक्षक ऐसा दर्पण है
जिसमे अपने चेहरा देखें
बच्चे हरपल हँसते हँसते
जैसा दर्पण वैसा चेहरा
जैसी चालें वैसा मोहरा
मोहरों को हर मुश्किल में
लड़ते रहना सिखलाना है
खुद ही बन के नयी प्रेरणा
बच्चों को दिखलाना है
तभी तो कुछ दे पाओगे
अपने में से बच्चों को
तभी तो कुछ कह पाओगे
इन सब मन के सच्चों को ।

ये माटी जैसे कच्ची कच्ची
ज्यूँ ढालोगे ढल जाएंगे
तुम बस थोड़ा हाथ लगाओ
नये नये बन जाएंगे
और जो तुम इनसे भागोगे
तो शिक्षा का क्या अर्थ रहा ?
ये शिक्षा केवल शब्द नहीं है
एक पूरा आंदोलन है

तुम गांधी हो आंदोलन के
तुम्हे आज़ादी अब लानी है
एक ऐसी फ़ौज बनानी है
जो सत्य अहिंसा के रस्ते में
चलके अपनी मंजिल पाये
रामानुजम के साथ चले
और रमन से हाथ मिलाएं
ग़ालिब से अल्फाज़ लिखें
विश्वेसरैया का मान बढ़ायें

तभी गर्व से कह सकते हो
शिक्षक हूँ मैं शिक्षक हूँ
कर्मो का और मूल्यों का
मैं इकलौता रक्षक हूँ ।

तुम गर ये कर सको तो
मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगा
शिक्षक था मैं शिक्षक हूँ मैं
गर्व से अपने बाद कहूंगा ।

Sunday, May 8, 2016

माँ




एक चाबी जैसे गुड्डे की तरह
बेफिक्र हो लगातार हर पल
जो चलती चली जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जो घर में मिठाई आती है
तो उसका क पेट भरा होता है
क्यूंकि बच्चे का मन हरा होता है
और उसको खिलाते वो मिठाई
अपनी आँखों से खाती है
वो माँ कहलाती है ।

ओढ़कर जब तुम चादर कहीं
सपनो में जी रहे होते हो
जो बुनकर एक कंबल नया
तुमको चुपके से ओढ़ा जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जिस स्वेटर को समझकर पुरानी
फेंक देते हो नयी चीजों के लिए
उसके रेशों में भर प्यार का शहद
एक नयी चाशनी बनती है
वो माँ कहलाती है ।

थक कर कभी जब सोती है
तुम्हारे जगने की रात होती है
कैसे नींद आये उसे !
थपकियों से कहानियो से
कोशिश करती
अपनी नींद भूल कर !
तुमको फिर जो सुलाती है
वो माँ कहलाती है ।

जाते हुये बलायें लेती
रो पड़ती तुम्हारे लिए
जाना तुम्हे होता है
जान उसकी जाती है
वो माँ कहलाती है ।

भागती जिंदगी में कदम तुम्हारे
बढ़ते चले जाते हैं
और थक जाते हो जब कभी
तो याद फिर आती है !
याद ! जो ठहरना सिखाती है
वो माँ कहलाती है ।

एक खांसी पर तुम्हारी
वो सर पे उठा लेती है आसमां
और वक़्त आने पर
लड़ भी लेती है वक़्त से
तुम्हारे लिए !
तुम्हे जिंदगी दे जाती है
वो माँ कहलाती है ।

तवे से उतार के रोटी में
प्यार गूंथकर देती है
तुम कुछ खा के
कुछ बचा के
खेलने चले जाते हो
फिर वो बासी रोटी
जिसके काम आती है
वो माँ कहलाती है ।

कभी कभी डांट कर तुम्हे
किचन के उस कोने में
चुपके चुपके रोती है
डांटना पड़ता है उसे
तुमको इंसान बनती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारे वादों पर हंसती
जो तुम तोड़ देते हो नयी सुबह
जिंदगी की हर सांझ में
अपना वादा निभाती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारी फ़िक्र में सूखती है
झुर्रियों के बीच कहीं
अपना ध्यान कहाँ उसे ?
अपनी फिक्र कहाँ  कर पाती है !
वो माँ कहलाती है ।

तुम बड़े हो जाते हो जल्दी !
ऊँचे भी !
देख नहीं पाते पीछे !
और नीचे भी !
वो बस आंसुओं में
घिरी रह जाती है ।
वो माँ कहलाती है ।

तुम उसका जीवन होते हो
वो तुम्हारा पुराना पंखा !
आवाज करती है न ?
पसंद नहीं आती !
याद करो कभी तुम्हारे रोने में !
तुम्हारी जिद में !
एक मतलब ढूंढ लेती थी !
आज भी कोशिश करती
पर तुम बड़े हो गए हो
बेचारी समझ नहीं पाती है
वो माँ कहलाती है ।





Saturday, October 3, 2015

नूर















वजह नहीं है आपसे वफ़ा करने की कोई
पर आप जैसा कभी कोई मिला नहीं है ।

मोहब्बत से महरूम था ताउम्र धड़कता दिल मेरा
दिल से पूछो ज़रा, इसको कोई गिला नहीं है ।

आपके झूले की डाली देखो बेरंग सी हो गयी
कोई पत्ता हिला नहीं है , कोई फूल खिला नहीं है ।

आपके नूर की बारिश को , कैद कर सके दीवारों में
ऐसी कोई जगह नहीं है , ऐसा कोई किला नहीं है ।

आपकी याद की पनाह में , आबाद है जिंदगी मेरी
मुलाकातों का अभी तक, कोई सिलसिला नहीं है ।

एक बार चाँद को , देख कर खिलखिला दिये
वो आज तक अहले वफ़ा , आसमां से हिला नहीं है ।





मौजूं















मेरी साँसों को घोल के गिलास के मौजूं में
आज उसने नयी नयी सी शराब बनायी है ।

नए इश्क़ का मौसम है जवां जवां
कुछ बदली बदली सी वो भी नजर आई है ।

मुझसे बिछड़ के आईने में इतराते हैं तेवर
ये कैसी मोहब्बत थी ! ये कैसी जुदाई है !

 मोहब्बत में तो फ़ना होने का उसूल मुनासिब है
गलत वो समझ बैठे , सजा हमने पायी है ।


मेरी मौत पर जश्न का इंतजाम करो यारो
जाम उठाओ की आज मेरी रूह की रिहाई है ।

मेरे क़त्ल का इल्जाम मेरी ही बेवफाई के सर है
उसने बड़ी शिद्दत से अपनी वफ़ा निभायी है ।

उसके आशिकों को देखो आज कफ़न काम पड़ गए
वो खुदा थी इनकी , ये उसकी खुदाई है ।

मेरे जिस्म पर कफ़न चढाने का बहाना ये नया है
फिर क़त्ल करने खंजर नया, बड़ी दूर से वो लायी है ।

Friday, October 2, 2015

रंग


मैंने तुम्हारे अस्तित्व में छुपी
अपनी सम्भावनायें तलाशी है
और समझा है स्वयं को
तुममें छनते हुए धीरे धीरे ।

बारीक रेशे की तरह रुई के फाहों में
गुन कर तुमने एक धागा बनाया है
फिर कभी ओढ़ लिया होगा इसे बेफिक्र सा
तभी तो तुम्हारा ही रंग नजर आया है ।

मेरी साँसों में धीरे से घुलता नशा
प्रतिबिम्ब है तुम्हारी याद का
मदहोश होती आत्मा डुबकी लगाती
एक निशान बच गया है साथ का ।

निशान …
जिसके सहारे मुझे जिंदगी चलानी है
वैसे ! जैसे बगैर पहिये के गाडी
इस खेल में तुम ही थे अनाड़ी !
इस खेल में तुम ही थे खिलाड़ी !
और मैं तो वैसे भी नहीं हूँ अब
शरीर यहाँ बाकी कहीं कहीं हूँ अब !
तो बताओ मुझे मुझको लौटाओगे ?
या कोई और रंग चढ़ाओगे !

Saturday, April 25, 2015

कागज़ का टुकड़ा

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कागज के टुकड़ों में दौड़ती जिंदगी उसकी
पता नहीं वापिस कब मिलेगी !
खो गयी है आश्वासनों के समुन्दर में
उड़ गयी है सत्ता के बवंडर में
एक फ़ाइल को ताकती पथरायी नजरें
कि उसकी बिजली कब लगेगी !

नाले को ही सांस बना चुका वो
जहर को पानी बना के पीने लगा है
कुछ सपने अपने कुछ पराये हुक्मरानो के
अब अगले साल में जिंदगी जीने लगा है !
कागज़ की कश्ती बनाता , चलाता
वो कागज के कुछ टुकड़े सीने लगा है ।


सड़कों पर काँप कर चलती इज्जत
हर आहट से घबरा सहम जाती है
क्या पता उसको अखबार का कोना न मिले कोई
ये जिंदगी हर बार कहाँ रहम खाती है !
कागज़ के टुकड़ों में वो केस ही नहीं बनता
जहाँ एक और निर्भया चली आती है ।


मौत से पहले जीने की कवायद में
कुछ कागज़ के टुकड़ो के लिए …
कागज के टुकड़े चाहिए
और उन कागज़ के टुकड़ों के लिए
एक और कागज़ का टुकड़ा चाहिए !

ये सर्कस है बाबू ! ऐसे ही चलता है
यहाँ कागज़ का टुकड़ा
बड़ी मुश्किल से मिलता है ।
और मिलने के बाद भी एक और ठप्पा चाहिए !
तभी तो भाई
कागज का टुकड़ा चलता है । 

Sunday, February 23, 2014

मैं राही नहीं हूँ

मैं पागल ही था,
जो राहों में निकला
मैं तिनका ही था,
सदाओं में बिखरा ।

वो राहें थी अद्भुत
वो मुझको बुलाती
मैं उनमे समाता
वो मुझमे समाती ।

वो राहें थी प्यारी
ज्यूँ हँसते हों बादल
घटायें उमड़कर
ज्यूँ फैलायें चादर ।

मुझे ले के जायें
एक ऐसे जहां में ..
एक ऐसे जहां में ..

जहाँ कोई झूला सा
परियाँ झुलाती
जहाँ थपकी दे के
हवायें सुलाती
जहाँ खिलखिलाहट
बरबस हंसाती
अठखेलियां कर
बूंदे सताती ।

उन राहों पे चलना
जैसे हो जीवन
बिना स्वांग के जैसे
अर्पण हो तन मन ।

जो सब कुछ है सुन्दर
तो फिर ये खटक क्यूँ ?
जो सब कुछ है अच्छा
तो फिर ये सनक क्यूँ ?

क्यूँ चलना है फिर से
नयी सी डगर पर ?
क्यूँ जाना है फिर से
नए से एक घर पर ?

मैं शायद इन राहों का
राही नहीं हूँ
मैं शायद फिजाओं का
आदी नहीं हूँ ।

मेरे पैरों में कांटे
हैं राहों को चुभते
कहो कैसे कांटे वो
मैं अब निकालूं ?
कहो कैसे राहों से
मैं अब विदा लूँ ?

मैं चलना भी चाहूँ
मैं हटना भी चाहूँ
मैं रुकना भी चाहूँ
मैं मुड़ना भी चाहूँ

मेरे दिल में कैसी
ये कैसी कशिश है !
मेरे दिल में छायी
ये कैसी तपिश है !

जो चलता रहा मैं
तो तय है कि हर पल
उन राहों की आँखों
में आंसू रहेंगे ।

जो चलता रहा मैं
तो राहों का सीना
मेरे आंसुओं से भी
छलनी रहेगा ।

और ये भी है फिर
कि राहों पे चलता
अकेला नहीं मैं
कोई और भी है ।

वो राहें है उसकी
वो उसकी रहेंगी
मेरी खुद की साँसे
बस इतना कहेंगी ।

और सच भी यही है
कि राहों से उसने
थे कांटे हटाये
राहों को चलने
के लायक बनाया ।

तो मंजिल पे ज्यादा
हक़ है उसी का
मेरी कोई मंजिल
कोई राहें नहीं है ।
मेरी कोई ख्वाहिश
कोई आहें नहीं है ।

मैं हूँ मुसाफिर
ले झोला दुखों का
राहों पे चलता
गिरता बिखरता ।

तो अच्छा यही है
कि कांटो को अपने
कहीं और बाँटू
राहों में फिर से
कोई राह छाँटू ।

जहाँ पर कभी मैं
झोला बदल कर
खुशियों कि बारिश
में ऐसे नहाऊं ..

कि राहें भी नाचें
बिना कंटकों के !
बिना आसुंओ के !

सपना ये मेरा
पर सपना रहेगा ।

जो मंजिल नहीं है
तो राहें क्यूँ होंगी ?
मैं शायद मुसाफिर
या राही नहीं हूँ ।

मैं चलता हूँ फिर भी
ये आशा को लेकर
कहीं मुझको अपना
ठिकाना मिलेगा ।

जहां मैं किसी को
आंसू के बदले
सुकूं की वो चादर
कभी तो ओढ़ा दूँ ।

कभी तो उन राहों से
उनकी निगाहों से
है जो वफ़ा सी
कभी तो निभा लूँ । 

Monday, September 30, 2013

गाँव ...


मेरे गाँव का रस्ता खाली पड़ा है
और पड़े हैं कुछ सूखे पत्ते
पलों को गिनते हुए ।

आवाज जो रुंधे गले से
निकलने की ख्वाइश में
खुद को ही दबा रही है  ।

कुछ लौटते क़दमों से उडती धूल
जिंदगी का एहसास देती
मुझे अँधा बना रही है ।

और देखूं भी तो क्या भला !
सन्नाटे का कोलाहल
आत्मा चीरता निकल जाता है
बिना रक्त की बूँद बहाए
और मैं रक्तबीज बन जाता हूँ
फिर से जीने के लिए !

कुछ खाली मकान है पास में
जिनको बनाने को घर
कभी पागल हुआ था कोई
आज वो फिर से ..
पागल हो गया है ।

कभी बांसुरी की तान पर नाचती,
ये हवा जहरीली है ।
सांस में रची बसी ..
सबको लील जाने के लिए
अट्टहास सी भयावह हंसी ।

गाँव
धारे पर गिरता वो झरना
अपना रंग बदल चुका है
देखो नदी भी स्याह है
रक्त अब काला हो चुका है ।

अमराई व्याकुल हो ताकती
उन इंसानी आवाजों को
जो अब मुर्दों की जुबां बोलते हैं
मुर्दा बन जाने के लिए ।

ओ मौत के देवता !
मुझे भी समा लो अपने में
मैं अपना गाँव फिर से बसाऊंगा
अपने में ही !

Tuesday, September 17, 2013

कान्हा



तू मेले को मक्खन दे
मैं चाट चाट के काऊंगा
मुद्को बी एकताला ला दे
मैं बी गाना गाऊंगा ।

मैया तेली डांट ते मुद्को
सच्ची में डल लगता है
मेला तू भलोचा कल्ल्ले
ताल नहीं मैं दाऊंगा ।

वो गोपी मुदे तिलाती है
अपने पात बुलाती है
फिल मैं दब मक्खन काता
तेले पात बताती है ।

तू उतको डाट लगा कल
मैं बी कुच हो दाऊंगा
पिल मैं नाच दिकाऊंगा
तेले मन को बाऊंगा ।

मैंने मिट्टी काई थी
वो लाधा ने मुदे किलाई थी
माँ लाधा मुदे तिलाती है
काला मुदे बुलाती है ।

माँ तू उतको डांट लगा दे
मैं अत्ता कान्हा बन दाऊंगा
फिल जो मिट्टी काई ती
तेले लिये मैं लाऊंगा ।

माँ मैं तो इतना तॊता हूँ
मक्कन उपल होता है
जब मैं उपल जाता हूँ
मक्कन नीचे ऒता है ।

माँ तू मेलको घड़ा ला दे
मैं मक्कन का हो जाऊँगा
फिल तू दब दब पास बुलाये
मैं भी गोदी आऊंगा ।

माँ मैंने कपले नई चुलाये
वो तब मुदे सताती है
मुदको कपडे पैनाकल अपने
चबको कूब हंचाती है ।

माँ उनको बी डांट लगा दे
मैं जमुना बन दाऊंगा
सलकंडे का पेल वहाँ है
बांतुली ले के आऊंगा । 

Monday, September 16, 2013

रक्तबीज



अखंड वार है प्रचंड
दुश्मनों को खंड खंड
कर चला है वीर हो
रक्तमय सा नीर हो ।

भुजाओं में फड़क नयी
आवाज में धमक वही
गरज के जो वो चले
तो क्या गलत है क्या सही !

रूद्र का प्रताप है
वो अनल का ही ताप है
वरदान है कहीं बना
कहीं पे वो शाप है ।

रोकती जहां जमीं
वो खोदता वहीँ वहीँ
शमशीर की टंकार से
फिर वहाँ गंगा बही ।

वो रक्तबीज है नया
न भाव है न है दया
वो मर गया वो कट गया
वो रास्तो में डट गया ।

हौसले जवाब दे
जब कभी वो सांस ले
थरथरा उठे कदम
लौह बन गया पदम् ।

भीख मांगते सभी
मृत्यु की पनाह में
जी गया वो मर के भी
मृत्यु की ही चाह में । 

Friday, September 6, 2013

मैं चाहता हूँ ...

मैं परिंदों के जहां में उड़कर
उनके पंख चुराना चाहता हूँ
उनको अपने जहां में लाकर
अपनी तरह उड़ाना चाहता हूँ ।



मैं आसमानों की बस्ती में नया
एक घर बनाना चाहता हूँ
बादलों की क्यारियों में
एक वृक्ष लगाना चाहता हूँ ।

मैं  बेपरवाह गिरती बूंदों को
पकड़कर सताना चाहता हूँ
मैं इन्द्रधनुष के रंगों से
एक रंग बनाना चाहता हूँ ।

मैं चाहता हूँ की कुछ सितारे नए
पूनम के चाँद से सुन्दर दिखें
मैं चाहता हूँ की कुछ बाजू नए
कवि की कल्पना से अच्छा लिखें।

मैं चाहता हूँ की क्षितिज में कहीं
एक आसमान जमी सच में मिलें
मैं चाहता हूँ की दो गुलाब नए
किसी जीवन मरू में फिर से खिलें ।

मैं चाहता हूँ की सरिता इठलाकर
सरोवर से बेतहाशा लड़ सके
मैं चाहता हूँ की निर्जीव अमरत्व
एक बार चैन से मर सके ।

मैं अंधेरों को गले लगाकर
खुद को मिटाना चाहता हूँ
मैं रोशनी के जालों को
एक बार हटाना चाहता हूँ ।

मैं रूप का तिरस्कार कर आज
अपनी कुरूपता को हँसाना चाहता हूँ
मैं मुट्ठी को बंद करके उसमें
वो पुरानी रेत फंसाना चाहता हूँ ।

मैं चाहता हूँ की ख़ामोशी आज
बातों से बातों में जीत जाए
मैं चाहता हूँ की ये जीवन अब
सपनो ही सपनो में बीत जाए ।

मैं स्वयं को समझकर आज
समझ को समझाना चाहता हूँ
मैं कालकोठरी बन चुके वही पुराने
अपने घर जाना चाहता हूँ ।

मैं शब्दों की गुलाम बन चुके
पुराने प्रतिमान हटाना चाहता हूँ
जो मुझको तुमको बाँध दें एक हस्ती में 
उस हस्ती की हस्ती मिटाना चाहता हूँ । 

Sunday, July 14, 2013

Lost

Whisper of the ‘song blue’,
Melancholy in colorless hue
She is mirrored in a tiny view
She vanishes like the dew...

And I search for fragrance
Nowhere to be found
I close my eyes and listen
Yet! There is no sound...

But the sound of silence,
Creating a buzzing void
Oh! My miserable self,
I cannot avoid ...

The pain of serenity,
making a dent deep
The vice of divinity
 Breaking the crystal heap ...

And my emotions tumble
Listen! A faded rumble
Still searching for signs.. 
Will she ever mumble ?  

Monday, July 8, 2013

मानसून

बारिश की फुहार और मेरी खिड़की ,
फिर से बातें करते हैं 
बुलबुले से उठते यादों की छतरियों में ..
पुरजोर जिंदगी जीते मनचलों सी 
खिलखिला कर मरते हैं । 

वो देखो बन गयी है नदी एक ...
नाले की ओट में !
भीगता बच्चा एक कागज की किश्ती को ..
जहाज बनाकर चला रहा है 
दौड़ता पास उसके किनारे 
सपनो से सपने मिला रहा है । 

वो देखो बूँद मचलकर पत्र की गोद में गिरी है ..
पर कसमसा के बढ़ चली है अपने मायके ..
चिढाती पत्र को अठखेलियाँ करती 
पर ये क्या !
चुरा ले गयी बीच में उसे हवा निराली 
एक कसम तोड़ी थी ,
एक कसम निभा ली । 

दूर क्षितिज में देखो एकाकार होते ,
व्योम और धरा ..
झीना पर्दा बनता बादल छुपाने को ...
पर तेज कहाँ छुपता है भला ?
मेरी खिड़की के जाले की तरह ..
आधा जला , आधा खुला । 

ऊपर मेला लगा है गुब्बारों का ,
नाचते खेलते फव्वारों का ,
सात रंग की चरखी चल रही है 
बैठकर जिसमे इतरा रही है कोयल 
चिढा रही है चातक को ..
जो इन्तजार में स्वाति नक्षत्र के 
ब्रहमचारी बना बैठा है । 

और देखकर ये सब अब अधीर मन 
भीगने को व्याकुल है ,
चलो भीग कर आते हैं कुछ देर ..
बच्चे बन जाते हैं कुछ देर 
नहीं तो लाख भिगो लो तन को ...
माटी है वो तो भीग ही जाएगा 
पर !
मन के भीतर उस उसर बंजर जमीन पर ..
सूखा फिर से लौट के आएगा ।