ऐ वीर पुत्र ! तू है खड़ा क्यूँ शीश को लिए झुका ...
पला है गोद में जहाँ तू उस धरा का ऋण चुका ...
धन नही मैं.....कुर्बानियों का जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |
क्या सोच के तू तज रहा है शमशीर की वो तेज धार ...
नपुंसक बना रहा है तुझे बन्धनों का छद्म प्यार ...
प्रेम नही ज्वाला का धधकता ...जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |
कोमलता अभिशाप है , लगी देश में आग है ...
सीमाओं के अन्दर बाहर.. जाने कितना दाग है ....
उस दाग को मिटा सके वो ...जूनून मांगता हूँ ..
मैं खून मांगता हूँ, मैं खून मांगता हूँ |
खो चुकी हँसी कहीं , रो रहा है देश आज ...
बुत न बन अनजान सा , तू भी उठा ले आवाज ...
ध्वनि नही चीत्कार सा ..जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ , मैं खून मांगता हूँ |
मर मर के तू है जी रहा , मुर्दों के संसार में ...
चल उठ खड़ा हो वार कर , पौरुष की धार में ...
बचा ले गर्व को जो वो ..सुकून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ,मैं खून मांगता हूँ |
क्रमशः ...
Monday, February 9, 2009
रेत
मैं घूमता सा बढ़ रहा था ...
झूमता सा चल रहा था ...
मरीचिका थी छल गई ...
वो रेत थी ..फिसल गई |
चमचमा रही थी वो भी ...
खिलखिला रही थी वो भी ...
सोच थी जल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
ख़ुद में धंसा लिया था मुझको ...
अपना बना लिया था मुझको ...
फ़िर चाल क्यूँ वो चल गई ?
वो रेत थी फिसल गई |
पादुकायें त्याग कर भागा ...
नीर तृष्णा में रात भर जागा ...
वो वाष्प बन निकल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
मैं निढाल हो गिर पड़ा था ...
प्राण त्याग मृत पड़ा था ...
वो सर्प बन निगल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
झूमता सा चल रहा था ...
मरीचिका थी छल गई ...
वो रेत थी ..फिसल गई |
चमचमा रही थी वो भी ...
खिलखिला रही थी वो भी ...
सोच थी जल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
ख़ुद में धंसा लिया था मुझको ...
अपना बना लिया था मुझको ...
फ़िर चाल क्यूँ वो चल गई ?
वो रेत थी फिसल गई |
पादुकायें त्याग कर भागा ...
नीर तृष्णा में रात भर जागा ...
वो वाष्प बन निकल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
मैं निढाल हो गिर पड़ा था ...
प्राण त्याग मृत पड़ा था ...
वो सर्प बन निगल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
Monday, January 5, 2009
प्रेम प्रस्ताव ...
तुझे आ बिठा कर ले चलूँ ...
उस चाँद के झरोखे में ...
डर है ये कि चाँद न ..
कहीं धूमल हो इस धोखे में ...
कि एक परी जन्नत से कहीं ..
उतर आई मेरे लिए ...
इतनी निश्चल इतनी कोमल ..
बिना कोई स्वाँग किए |
वो मुस्कुरायी तो फूल खिल उठे ...
वो खिलखिलाई तो बिछडे मिल उठे ..
सौंदर्य कहते हैं सभी उसे ..
मैंने कहा तो अधर सिल उठे |
उसकी वो लट गालों से झूम के इतराई ..
आंखों की चमक जाने क्या कह आई ?
सोचता रह गया मैं कहाँ से ...
इतना स्नेह-प्रेम-सौंदर्य वो ले आई ?
नजर नही हटी जब देर तक मेरी ..
चुपके से वो यूँ शरमाई ...
इस पल पर पूरी कायनात लुटा दूँ ..
सोच मेरी आँखें भर आई |
मधुर वाणी में कुछ उसने बोला ...
जैसे सहस्त्रों वीणा के तारों को खोला ..
मन झंकृत कर गया वो एक ही शब्द ...
अर्थ बड़ा पर कितना भोला |
नज़ारे शायद बनते रहेंगे ...
ये पल भी समय छलनी में छनते रहेंगे ..
जोडियाँ स्वर्ग में बनती है शायद ..
हाँ ये रिश्ते यूँ ही बनते रहेंगे |
हे प्रिये ! इसे स्वीकार करो ...
अन्तः मन से अंगीकार करो ...
मैं ह्रदय फैलाये बैठा हूँ ..
तुम उर पुष्प का वार करो !
ये प्रेम मेरा कुछ सादा है ...
लेकिन अनंत से ज्यादा है ..
क्या बनोगी मेरी जीवन संगिनी ?
मैं चातक बनूँगा ये वादा है |
उस चाँद के झरोखे में ...
डर है ये कि चाँद न ..
कहीं धूमल हो इस धोखे में ...
कि एक परी जन्नत से कहीं ..
उतर आई मेरे लिए ...
इतनी निश्चल इतनी कोमल ..
बिना कोई स्वाँग किए |
वो मुस्कुरायी तो फूल खिल उठे ...
वो खिलखिलाई तो बिछडे मिल उठे ..
सौंदर्य कहते हैं सभी उसे ..
मैंने कहा तो अधर सिल उठे |
उसकी वो लट गालों से झूम के इतराई ..
आंखों की चमक जाने क्या कह आई ?
सोचता रह गया मैं कहाँ से ...
इतना स्नेह-प्रेम-सौंदर्य वो ले आई ?
नजर नही हटी जब देर तक मेरी ..
चुपके से वो यूँ शरमाई ...
इस पल पर पूरी कायनात लुटा दूँ ..
सोच मेरी आँखें भर आई |
मधुर वाणी में कुछ उसने बोला ...
जैसे सहस्त्रों वीणा के तारों को खोला ..
मन झंकृत कर गया वो एक ही शब्द ...
अर्थ बड़ा पर कितना भोला |
नज़ारे शायद बनते रहेंगे ...
ये पल भी समय छलनी में छनते रहेंगे ..
जोडियाँ स्वर्ग में बनती है शायद ..
हाँ ये रिश्ते यूँ ही बनते रहेंगे |
हे प्रिये ! इसे स्वीकार करो ...
अन्तः मन से अंगीकार करो ...
मैं ह्रदय फैलाये बैठा हूँ ..
तुम उर पुष्प का वार करो !
ये प्रेम मेरा कुछ सादा है ...
लेकिन अनंत से ज्यादा है ..
क्या बनोगी मेरी जीवन संगिनी ?
मैं चातक बनूँगा ये वादा है |
जय गान ...
वो चल पड़ा है वीर एक ...
हाथ में लिए त्रिशूल ...
सोचता नही जो परिणिति ...
फ़िर क्या है पुष्प क्या है शूल |
अंगारे बिखराती पलकें ...
ख़ुद को ही जला रही है ...
आंधी ले आई सासें ...
जीवन को चला रही है |
मदमस्त गज सी चाल है ...
प्रखर सा वो भाल है ...
कभी हुआ करता था मित्र ...
आज वो एक काल है |
लक्ष्य है अब दिख रहा ...
सामने उसे प्रत्यक्ष ...
तडित झंझा का वेग है ...
चल में वो है दक्ष |
हाहाकार कर उठी प्रकृति ...
देखकर ये ज्वाल मुख ...
भाव रहित अक्षि लिए ...
न कोई सुख न कोई दुःख |
वीर तू आगे निकल ...
सारा जहाँ स्वागत करेगा ...
जीत ले अपने प्रताप को ...
कायर यहाँ गिर मरेगा |
कुछ समय पश्चात् ...
जीत ...एक मंत्र है
अभिलाषा का
आशा का
हर्ष की
परिभाषा का
जो है लिए
एक भाव नया
जिसमें सबने
विश्वास किया
वो फलीभूत
हो चुका है
कुहरा घना
रो चुका है ॥
नई सुबह
आ रही है
कोयल देखो
गा रही है ....
हाथ में लिए त्रिशूल ...
सोचता नही जो परिणिति ...
फ़िर क्या है पुष्प क्या है शूल |
अंगारे बिखराती पलकें ...
ख़ुद को ही जला रही है ...
आंधी ले आई सासें ...
जीवन को चला रही है |
मदमस्त गज सी चाल है ...
प्रखर सा वो भाल है ...
कभी हुआ करता था मित्र ...
आज वो एक काल है |
लक्ष्य है अब दिख रहा ...
सामने उसे प्रत्यक्ष ...
तडित झंझा का वेग है ...
चल में वो है दक्ष |
हाहाकार कर उठी प्रकृति ...
देखकर ये ज्वाल मुख ...
भाव रहित अक्षि लिए ...
न कोई सुख न कोई दुःख |
वीर तू आगे निकल ...
सारा जहाँ स्वागत करेगा ...
जीत ले अपने प्रताप को ...
कायर यहाँ गिर मरेगा |
कुछ समय पश्चात् ...
जीत ...एक मंत्र है
अभिलाषा का
आशा का
हर्ष की
परिभाषा का
जो है लिए
एक भाव नया
जिसमें सबने
विश्वास किया
वो फलीभूत
हो चुका है
कुहरा घना
रो चुका है ॥
नई सुबह
आ रही है
कोयल देखो
गा रही है ....
Tuesday, December 30, 2008
सोमेश पारुल
ओस की बूंदें
मोती लुटा रही हैं...
समीर की बाहें,
कण कण जुटा रही है ...
एक ईश है जना जो,
वो सोम का प्रतिसाद है ..
सोमेश का ही गर्व है,
वो गर्व का ही नाद है ....
कुहासे की चादर तले,
इक मर्म पल रहा है ...
पारुल की एक छवि है,
जो स्फटिक छल रहा है |
श्वेत बर्फ ख़ुद में समेटे,
नीलिमा सा बन रहा है ...
सात रंग के सात भाव ,
स्व गात में छन रहा है |
इस मुग्ध दृश्य की वेदना में,
सोमेश का ही हृद खिला है ..
इस अलौकिक चेतना में,
पार कहीं एक उल मिला है |
ये दिवस का प्रतिसाद है ...
जन्मदिन कुछ ख़ास है ...
वर्ष की यादें पास है ...
अंतर्मन में परिहास है ..
मन में किसी का वास है |
सोमेश का मर्म,
अनूठा अनूप,
एक ब्रहम का अनुभव ...
दिव्य स्वरुप ...
नीर की खामोशी ...
जलोधि का उफान ..
असत्य की पराजय ..
सत्य का प्रमाण ..
पूरे मन से ...
तप से ..अर्पण से ...
बधाइयाँ ...जन्मदिवस के शगल की ..
जीवन में परिवर्तन युगल की |
मोती लुटा रही हैं...
समीर की बाहें,
कण कण जुटा रही है ...
एक ईश है जना जो,
वो सोम का प्रतिसाद है ..
सोमेश का ही गर्व है,
वो गर्व का ही नाद है ....
कुहासे की चादर तले,
इक मर्म पल रहा है ...
पारुल की एक छवि है,
जो स्फटिक छल रहा है |
श्वेत बर्फ ख़ुद में समेटे,
नीलिमा सा बन रहा है ...
सात रंग के सात भाव ,
स्व गात में छन रहा है |
इस मुग्ध दृश्य की वेदना में,
सोमेश का ही हृद खिला है ..
इस अलौकिक चेतना में,
पार कहीं एक उल मिला है |
ये दिवस का प्रतिसाद है ...
जन्मदिन कुछ ख़ास है ...
वर्ष की यादें पास है ...
अंतर्मन में परिहास है ..
मन में किसी का वास है |
सोमेश का मर्म,
अनूठा अनूप,
एक ब्रहम का अनुभव ...
दिव्य स्वरुप ...
नीर की खामोशी ...
जलोधि का उफान ..
असत्य की पराजय ..
सत्य का प्रमाण ..
पूरे मन से ...
तप से ..अर्पण से ...
बधाइयाँ ...जन्मदिवस के शगल की ..
जीवन में परिवर्तन युगल की |
Monday, December 15, 2008
झरोखा ...
श्वेत धवल निर्मल चंचल ,
एक पवन चली संग प्रीत लिए ...
वो शौर्यवान, बलवान, प्रवीण का ..
प्रिया ह्रदय का गीत लिए ...|
ये मंद हवा की भांति सरल ,
जिसका अन्तः है विशाल विरल ...
समा सकता है ..ब्रह्म फिजा में ,
फ़िर क्या ठोस और क्या तरल !
भोर का नन्हा स्पर्श दिया ,
फ़िर दिवा सौर से युद्ध किया ..
झंझा को समेटे ख़ुद में ,
सोम दिया ...और दर्द लिया |
कहीं बालक की लोरी बन आई,
कहीं फसलों में हरियाली छाई ....
स्वेद बिन्दु को किया आत्मसात ...
मुस्कान किसी की मुस्काई !
प्रवीण वायु की है बारात जो,
भावों का जलसा ले आई ...
धरा में विचरण किया है उसने ...
स्व प्रिया हेतु नभ में छाई |
हे प्रिया ! इसे स्वीकार करो ...
अन्तः मन से अंगीकार करो ...
प्रबल प्रवीण की विजय पताका ...
उर पुष्प का वार करो !!
एक पवन चली संग प्रीत लिए ...
वो शौर्यवान, बलवान, प्रवीण का ..
प्रिया ह्रदय का गीत लिए ...|
ये मंद हवा की भांति सरल ,
जिसका अन्तः है विशाल विरल ...
समा सकता है ..ब्रह्म फिजा में ,
फ़िर क्या ठोस और क्या तरल !
भोर का नन्हा स्पर्श दिया ,
फ़िर दिवा सौर से युद्ध किया ..
झंझा को समेटे ख़ुद में ,
सोम दिया ...और दर्द लिया |
कहीं बालक की लोरी बन आई,
कहीं फसलों में हरियाली छाई ....
स्वेद बिन्दु को किया आत्मसात ...
मुस्कान किसी की मुस्काई !
प्रवीण वायु की है बारात जो,
भावों का जलसा ले आई ...
धरा में विचरण किया है उसने ...
स्व प्रिया हेतु नभ में छाई |
हे प्रिया ! इसे स्वीकार करो ...
अन्तः मन से अंगीकार करो ...
प्रबल प्रवीण की विजय पताका ...
उर पुष्प का वार करो !!
Tuesday, November 11, 2008
मैं सुलग रहा हूँ
मैं सुलग रहा हूँ ...
इस धधकती आग में ,
अपना शीश नीचे किए
धूम्र को कंठ पिए |
मैं सुलग रहा हूँ ...
इन अनजाने जज्बातों में ,
जो असत्य कसौटी पर
जगाते दिल में डर |
मैं सुलग रहा हूँ ...
अपनी ही इच्छाओं की गोद में ,
जो मर रही हैं कब से
छुपता रहा जिन्हें सब से |
मैं सुलग रहा हूँ ...
चेहरों के इस आशियाने में ,
जिसमें हर चेहरा मेरा है
फ़िर भी अक्स तेरा है |
मैं सुलग रहा हूँ ...
योजनाओं के अखाडे में ,
जो मुझे तोड़ रही हैं
बेबस सा अलग छोड़ रही हैं |
मैं सुलग रहा हूँ ...
सपनो के संसार में ,
जिसे वास्तविकता बनाना था
एक बाग़ नया सजाना था |
मैं सुलग रहा हूँ ...
अपनी तन्हाई में ,
जो साथ हो सकता था
मरू में एक पात हो सकता था |
मैं सुलग रहा हूँ ...
अपनी ही बातों में ,
जो दिल में होनी थी
मौके पर खोनी थी |
मैं सुलग रहा हूँ ...
लेकिन आज भी आता नही कोई ,
ये समझने कि मैं कहाँ बहा हूँ ...
मैं क्यूँ सुलग रहा हूँ !!!!!
इस धधकती आग में ,
अपना शीश नीचे किए
धूम्र को कंठ पिए |
मैं सुलग रहा हूँ ...
इन अनजाने जज्बातों में ,
जो असत्य कसौटी पर
जगाते दिल में डर |
मैं सुलग रहा हूँ ...
अपनी ही इच्छाओं की गोद में ,
जो मर रही हैं कब से
छुपता रहा जिन्हें सब से |
मैं सुलग रहा हूँ ...
चेहरों के इस आशियाने में ,
जिसमें हर चेहरा मेरा है
फ़िर भी अक्स तेरा है |
मैं सुलग रहा हूँ ...
योजनाओं के अखाडे में ,
जो मुझे तोड़ रही हैं
बेबस सा अलग छोड़ रही हैं |
मैं सुलग रहा हूँ ...
सपनो के संसार में ,
जिसे वास्तविकता बनाना था
एक बाग़ नया सजाना था |
मैं सुलग रहा हूँ ...
अपनी तन्हाई में ,
जो साथ हो सकता था
मरू में एक पात हो सकता था |
मैं सुलग रहा हूँ ...
अपनी ही बातों में ,
जो दिल में होनी थी
मौके पर खोनी थी |
मैं सुलग रहा हूँ ...
लेकिन आज भी आता नही कोई ,
ये समझने कि मैं कहाँ बहा हूँ ...
मैं क्यूँ सुलग रहा हूँ !!!!!
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