Wednesday, April 1, 2009

पुष्प और तितली

फक्र करता था फूल जो अपनी रंगेशुमारी पर ...
किराये के रंग वर्ण और छद्म आभा खुमारी पर ...

तोड़ कर उसका गुरूर तितली ने दिखा दिया ...
रंगों का वितरण अनोखा कैसे ? उसको सिखा दिया ...

खुद में रंगे तो क्या रंगे ! सिमट पड़े एक मुष्टिका में ...
रंगना है तो आसमान को रंगों दिल की वृतिक्का में ..

सिमट गए खुद में ही तो अस्तित्व ही मिट जायेगा ...
खुद को फैलाओ धरा में गात अमर हो जायेगा ...

पुष्प ! तुम्हारा अस्तित्व है गर और पुष्प रंग हैं ...
तितली तो बस द्विगुणित करती तुम्हें ! जैसे अनंग है ..|

Monday, March 9, 2009

रंग और होली

रंग और लहू में अन्तर नही बचा है ...
कोई भाल पर लगा है ..
कोई भाल पर सजा है ...
एक एक रक्त बूँद छूटती जा रही है ...
और वो कहते हैं, होली आ रही है !!

होली तो था प्रेम का सद्भाव का पुलिंदा ...
धर्म जाति भेद में रहा न भाव जिन्दा ...
आज गले मिलने में भी भय सोच ला रही है ...
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!

दहन था उस होलिका का , बदी की जो प्रतीक थी ...
जल में पाप धुलते थे तब ..होली की ये सीख थी ...
आज हाय ! अग्नि ये क्यूँ प्रहलाद को जला रही है ... ?
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!

कुछ गीत हो रहे हैं ? या ये मेरा भ्रम है ...
क्रंदन हो रहा चहुँ ओर ..ये तो सिर्फ़ तम है ...
आशा भी मर चुकी है अब जिंदगी सता रही है ...
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!

Wednesday, March 4, 2009

हवा

कल सुबह जागने के बाद अलसाई आँखें लिए जैसे ही मैंने दरवाजा खोला सामने किसी को खडा पाया | वो टुकुर टुकुर मुझे निहार रही थी | मैंने आँखें भींच कर उससे विलग होने का प्रयास किया लेकिन मन से उसे हटा नहीं पाया, एहसास से उसे मिटा नहीं पाया | हार कर मैंने आँखें खोली और तभी मुझे ध्यान आया की इसे तो मैंने कल भी देखा है ..परसों भी ...उससे पहले भी ... | पहली बात उसे कब देखा ये सोच नहीं पाया ! वो अभी भी मुस्कुरा रही थी | उसकी आँखों में अजीब सा सुकून था | अचानक उसने मुझे धीरे से छू लिया | मैं चौंक गया ..घबरा गया ..लेकिन अगले ही पल इक कोमल स्पर्श का शीतल अनुभव हुआ | एसा लगा जैसे असंख्य पंख बिना मेरी इच्छा के पूरी शिद्दत के साथ मनुहार कर रहे हैं और मैं मदहोश हो बस उस दिव्य तरंगिनी में बहता चला जा रहा हूँ | डरते हुए मैंने भी उसकी ओर हाथ बढाया लेकिन उसे छू न पाया बस इक स्वर्गिक आनंद का अभी भी अनुभव हो रहा था |

Monday, February 9, 2009

खून मांगता हूँ ...

ऐ वीर पुत्र ! तू है खड़ा क्यूँ शीश को लिए झुका ...
पला है गोद में जहाँ तू उस धरा का ऋण चुका ...
धन नही मैं.....कुर्बानियों का जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |

क्या सोच के तू तज रहा है शमशीर की वो तेज धार ...
नपुंसक बना रहा है तुझे बन्धनों का छद्म प्यार ...
प्रेम नही ज्वाला का धधकता ...जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |

कोमलता अभिशाप है , लगी देश में आग है ...
सीमाओं के अन्दर बाहर.. जाने कितना दाग है ....
उस दाग को मिटा सके वो ...जूनून मांगता हूँ ..
मैं खून मांगता हूँ, मैं खून मांगता हूँ |

खो चुकी हँसी कहीं , रो रहा है देश आज ...
बुत न बन अनजान सा , तू भी उठा ले आवाज ...
ध्वनि नही चीत्कार सा ..जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ , मैं खून मांगता हूँ |

मर मर के तू है जी रहा , मुर्दों के संसार में ...
चल उठ खड़ा हो वार कर , पौरुष की धार में ...
बचा ले गर्व को जो वो ..सुकून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ,मैं खून मांगता हूँ |

क्रमशः ...

रेत

मैं घूमता सा बढ़ रहा था ...
झूमता सा चल रहा था ...
मरीचिका थी छल गई ...
वो रेत थी ..फिसल गई |

चमचमा रही थी वो भी ...
खिलखिला रही थी वो भी ...
सोच थी जल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |

ख़ुद में धंसा लिया था मुझको ...
अपना बना लिया था मुझको ...
फ़िर चाल क्यूँ वो चल गई ?
वो रेत थी फिसल गई |

पादुकायें त्याग कर भागा ...
नीर तृष्णा में रात भर जागा ...
वो वाष्प बन निकल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |

मैं निढाल हो गिर पड़ा था ...
प्राण त्याग मृत पड़ा था ...
वो सर्प बन निगल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |

Monday, January 5, 2009

प्रेम प्रस्ताव ...

तुझे आ बिठा कर ले चलूँ ...
उस चाँद के झरोखे में ...
डर है ये कि चाँद न ..
कहीं धूमल हो इस धोखे में ...

कि एक परी जन्नत से कहीं ..
उतर आई मेरे लिए ...
इतनी निश्चल इतनी कोमल ..
बिना कोई स्वाँग किए |

वो मुस्कुरायी तो फूल खिल उठे ...
वो खिलखिलाई तो बिछडे मिल उठे ..
सौंदर्य कहते हैं सभी उसे ..
मैंने कहा तो अधर सिल उठे |

उसकी वो लट गालों से झूम के इतराई ..
आंखों की चमक जाने क्या कह आई ?
सोचता रह गया मैं कहाँ से ...
इतना स्नेह-प्रेम-सौंदर्य वो ले आई ?

नजर नही हटी जब देर तक मेरी ..
चुपके से वो यूँ शरमाई ...
इस पल पर पूरी कायनात लुटा दूँ ..
सोच मेरी आँखें भर आई |

मधुर वाणी में कुछ उसने बोला ...
जैसे सहस्त्रों वीणा के तारों को खोला ..
मन झंकृत कर गया वो एक ही शब्द ...
अर्थ बड़ा पर कितना भोला |

नज़ारे शायद बनते रहेंगे ...
ये पल भी समय छलनी में छनते रहेंगे ..
जोडियाँ स्वर्ग में बनती है शायद ..
हाँ ये रिश्ते यूँ ही बनते रहेंगे |

हे प्रिये ! इसे स्वीकार करो ...
अन्तः मन से अंगीकार करो ...
मैं ह्रदय फैलाये बैठा हूँ ..
तुम उर पुष्प का वार करो !

ये प्रेम मेरा कुछ सादा है ...
लेकिन अनंत से ज्यादा है ..
क्या बनोगी मेरी जीवन संगिनी ?
मैं चातक बनूँगा ये वादा है |

जय गान ...

वो चल पड़ा है वीर एक ...
हाथ में लिए त्रिशूल ...
सोचता नही जो परिणिति ...
फ़िर क्या है पुष्प क्या है शूल |

अंगारे बिखराती पलकें ...
ख़ुद को ही जला रही है ...
आंधी ले आई सासें ...
जीवन को चला रही है |

मदमस्त गज सी चाल है ...
प्रखर सा वो भाल है ...
कभी हुआ करता था मित्र ...
आज वो एक काल है |

लक्ष्य है अब दिख रहा ...
सामने उसे प्रत्यक्ष ...
तडित झंझा का वेग है ...
चल में वो है दक्ष |

हाहाकार कर उठी प्रकृति ...
देखकर ये ज्वाल मुख ...
भाव रहित अक्षि लिए ...
न कोई सुख न कोई दुःख |

वीर तू आगे निकल ...
सारा जहाँ स्वागत करेगा ...
जीत ले अपने प्रताप को ...
कायर यहाँ गिर मरेगा |

कुछ समय पश्चात् ...

जीत ...एक मंत्र है
अभिलाषा का
आशा का
हर्ष की
परिभाषा का
जो है लिए
एक भाव नया
जिसमें सबने
विश्वास किया
वो फलीभूत
हो चुका है
कुहरा घना
रो चुका है ॥
नई सुबह
आ रही है
कोयल देखो
गा रही है ....