मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
चलता फिरता ...
बर्फ का टुकडा ...
जोश में भी पिघल जाता हूँ ...
ख्वाब अपने निगल जाता हूँ ...
राह बनती है ..है तो ..फिर
दूसरी ओर निकल जाता हूँ ...
मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
मुझे डर लगता है ...
अट्टालिकाओं से !
जिसमें मेरा पसीना लगा है ...
और चार पहिये के उस इंसान से ...
जो दौड़ता है ..बरबस ...
मेरी जान लेने के लिये |
मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
पेट पर रखकर पत्थर ...
सोचता हूँ भूख मिट गयी ...
और भूल कर भी नहीं देखता सामने ...
क्या पता कोई स्वान बिस्किट खाता दिख पड़े |
मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
छुप छुप कर लकडी जला कर ...
कुछ आधी जली रोटी सेंकता हूँ ...
कुछ बड़े लोग आकर ..तोड़ देते चूल्हा मेरा ...
कहते परदुषण होगा !!!!
मैं लिपट जाता अपने चीथडो वाले कम्बल में ...
और देखता उन्हें उनकी कार में ...धुंआ उडा कर ...
पास के कारखाने के गंदे नाले के किनारे चलते हुए |
मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
मेरा बच्चा खेलता है नगरपालिका के डब्बे में ...
कुछ सभ्य से बच्चे आकर नाक बंद कर निकल जाते हैं ...
और फेंक जाते हैं टॉफी के कपडे खरे !
वो सोचता है कि कचरे के डब्बे में क्यूँ नहीं फेंका इसे ?
फिर बटोर कर उन्हें ...अपनी खेलती दुनिया में रम जाता है |
मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
सपने दिखाता लोगों को अपनी डुगडुगी बजाकर..
आवाज जिसकी मेरे आलावा सुनते हैं सभी ...
मैं भी सुनता हूँ लेकिन अन्तः में नहीं !
डरता हूँ जीवन तो टूट गया है ....
सपने न टूट जाएँ कहीं |
Thursday, May 28, 2009
Thursday, April 9, 2009
शर्माना तेरा .....
शर्माना तेरा ...
जैसे अक्स से नजरें चुराना तेरा ...
जैसे ख्वाबों की बटिया जोह के ...
फिर तेरे घर आना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे बात बात पर बच्चे सा इतराना तेरा ..
जैसे ओस की सप्तरंग छटा में प्रातः ...
निस्तब्ध सा डूब जाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे उस अदा से नजरें झुकाना तेरा ..
जैसे नए साज को खोजता ...
वो टूटा ढोलक पुराना मेरा |
शर्माना तेरा ....
जैसे उस हंसी को अधरों में छिपाना तेरा ...
जैसे बोलने की हसरत दिल में लिए ...
हर एक शब्द भूल जाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे उँगलियों से लट को उलझाना तेरा ...
जैसे उस लट को छूने की कोशिश में ...
हाथ से हाथ को दबाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे भाल में सिलवटें पड़ जाना तेरा ...
जैसे तरंगिनियों के मेले में विस्मित ...
तुझ पर मर जाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे एक कायनात के जन्म का फ़साना तेरा ...
जैसे तुझे पाने की आस में ...
प्रकृति सा शिशु बन जाना मेरा |
~वैभव
जैसे अक्स से नजरें चुराना तेरा ...
जैसे ख्वाबों की बटिया जोह के ...
फिर तेरे घर आना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे बात बात पर बच्चे सा इतराना तेरा ..
जैसे ओस की सप्तरंग छटा में प्रातः ...
निस्तब्ध सा डूब जाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे उस अदा से नजरें झुकाना तेरा ..
जैसे नए साज को खोजता ...
वो टूटा ढोलक पुराना मेरा |
शर्माना तेरा ....
जैसे उस हंसी को अधरों में छिपाना तेरा ...
जैसे बोलने की हसरत दिल में लिए ...
हर एक शब्द भूल जाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे उँगलियों से लट को उलझाना तेरा ...
जैसे उस लट को छूने की कोशिश में ...
हाथ से हाथ को दबाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे भाल में सिलवटें पड़ जाना तेरा ...
जैसे तरंगिनियों के मेले में विस्मित ...
तुझ पर मर जाना मेरा |
शर्माना तेरा ...
जैसे एक कायनात के जन्म का फ़साना तेरा ...
जैसे तुझे पाने की आस में ...
प्रकृति सा शिशु बन जाना मेरा |
~वैभव
Wednesday, April 1, 2009
पुष्प और तितली
फक्र करता था फूल जो अपनी रंगेशुमारी पर ...
किराये के रंग वर्ण और छद्म आभा खुमारी पर ...
तोड़ कर उसका गुरूर तितली ने दिखा दिया ...
रंगों का वितरण अनोखा कैसे ? उसको सिखा दिया ...
खुद में रंगे तो क्या रंगे ! सिमट पड़े एक मुष्टिका में ...
रंगना है तो आसमान को रंगों दिल की वृतिक्का में ..
सिमट गए खुद में ही तो अस्तित्व ही मिट जायेगा ...
खुद को फैलाओ धरा में गात अमर हो जायेगा ...
पुष्प ! तुम्हारा अस्तित्व है गर और पुष्प रंग हैं ...
तितली तो बस द्विगुणित करती तुम्हें ! जैसे अनंग है ..|
किराये के रंग वर्ण और छद्म आभा खुमारी पर ...
तोड़ कर उसका गुरूर तितली ने दिखा दिया ...
रंगों का वितरण अनोखा कैसे ? उसको सिखा दिया ...
खुद में रंगे तो क्या रंगे ! सिमट पड़े एक मुष्टिका में ...
रंगना है तो आसमान को रंगों दिल की वृतिक्का में ..
सिमट गए खुद में ही तो अस्तित्व ही मिट जायेगा ...
खुद को फैलाओ धरा में गात अमर हो जायेगा ...
पुष्प ! तुम्हारा अस्तित्व है गर और पुष्प रंग हैं ...
तितली तो बस द्विगुणित करती तुम्हें ! जैसे अनंग है ..|
Monday, March 9, 2009
रंग और होली
रंग और लहू में अन्तर नही बचा है ...
कोई भाल पर लगा है ..
कोई भाल पर सजा है ...
एक एक रक्त बूँद छूटती जा रही है ...
और वो कहते हैं, होली आ रही है !!
होली तो था प्रेम का सद्भाव का पुलिंदा ...
धर्म जाति भेद में रहा न भाव जिन्दा ...
आज गले मिलने में भी भय सोच ला रही है ...
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!
दहन था उस होलिका का , बदी की जो प्रतीक थी ...
जल में पाप धुलते थे तब ..होली की ये सीख थी ...
आज हाय ! अग्नि ये क्यूँ प्रहलाद को जला रही है ... ?
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!
कुछ गीत हो रहे हैं ? या ये मेरा भ्रम है ...
क्रंदन हो रहा चहुँ ओर ..ये तो सिर्फ़ तम है ...
आशा भी मर चुकी है अब जिंदगी सता रही है ...
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!
कोई भाल पर लगा है ..
कोई भाल पर सजा है ...
एक एक रक्त बूँद छूटती जा रही है ...
और वो कहते हैं, होली आ रही है !!
होली तो था प्रेम का सद्भाव का पुलिंदा ...
धर्म जाति भेद में रहा न भाव जिन्दा ...
आज गले मिलने में भी भय सोच ला रही है ...
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!
दहन था उस होलिका का , बदी की जो प्रतीक थी ...
जल में पाप धुलते थे तब ..होली की ये सीख थी ...
आज हाय ! अग्नि ये क्यूँ प्रहलाद को जला रही है ... ?
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!
कुछ गीत हो रहे हैं ? या ये मेरा भ्रम है ...
क्रंदन हो रहा चहुँ ओर ..ये तो सिर्फ़ तम है ...
आशा भी मर चुकी है अब जिंदगी सता रही है ...
और वो कहते हैं , होली आ रही है !!
Wednesday, March 4, 2009
हवा
कल सुबह जागने के बाद अलसाई आँखें लिए जैसे ही मैंने दरवाजा खोला सामने किसी को खडा पाया | वो टुकुर टुकुर मुझे निहार रही थी | मैंने आँखें भींच कर उससे विलग होने का प्रयास किया लेकिन मन से उसे हटा नहीं पाया, एहसास से उसे मिटा नहीं पाया | हार कर मैंने आँखें खोली और तभी मुझे ध्यान आया की इसे तो मैंने कल भी देखा है ..परसों भी ...उससे पहले भी ... | पहली बात उसे कब देखा ये सोच नहीं पाया ! वो अभी भी मुस्कुरा रही थी | उसकी आँखों में अजीब सा सुकून था | अचानक उसने मुझे धीरे से छू लिया | मैं चौंक गया ..घबरा गया ..लेकिन अगले ही पल इक कोमल स्पर्श का शीतल अनुभव हुआ | एसा लगा जैसे असंख्य पंख बिना मेरी इच्छा के पूरी शिद्दत के साथ मनुहार कर रहे हैं और मैं मदहोश हो बस उस दिव्य तरंगिनी में बहता चला जा रहा हूँ | डरते हुए मैंने भी उसकी ओर हाथ बढाया लेकिन उसे छू न पाया बस इक स्वर्गिक आनंद का अभी भी अनुभव हो रहा था |
Monday, February 9, 2009
खून मांगता हूँ ...
ऐ वीर पुत्र ! तू है खड़ा क्यूँ शीश को लिए झुका ...
पला है गोद में जहाँ तू उस धरा का ऋण चुका ...
धन नही मैं.....कुर्बानियों का जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |
क्या सोच के तू तज रहा है शमशीर की वो तेज धार ...
नपुंसक बना रहा है तुझे बन्धनों का छद्म प्यार ...
प्रेम नही ज्वाला का धधकता ...जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |
कोमलता अभिशाप है , लगी देश में आग है ...
सीमाओं के अन्दर बाहर.. जाने कितना दाग है ....
उस दाग को मिटा सके वो ...जूनून मांगता हूँ ..
मैं खून मांगता हूँ, मैं खून मांगता हूँ |
खो चुकी हँसी कहीं , रो रहा है देश आज ...
बुत न बन अनजान सा , तू भी उठा ले आवाज ...
ध्वनि नही चीत्कार सा ..जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ , मैं खून मांगता हूँ |
मर मर के तू है जी रहा , मुर्दों के संसार में ...
चल उठ खड़ा हो वार कर , पौरुष की धार में ...
बचा ले गर्व को जो वो ..सुकून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ,मैं खून मांगता हूँ |
क्रमशः ...
पला है गोद में जहाँ तू उस धरा का ऋण चुका ...
धन नही मैं.....कुर्बानियों का जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |
क्या सोच के तू तज रहा है शमशीर की वो तेज धार ...
नपुंसक बना रहा है तुझे बन्धनों का छद्म प्यार ...
प्रेम नही ज्वाला का धधकता ...जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ...मैं खून मांगता हूँ |
कोमलता अभिशाप है , लगी देश में आग है ...
सीमाओं के अन्दर बाहर.. जाने कितना दाग है ....
उस दाग को मिटा सके वो ...जूनून मांगता हूँ ..
मैं खून मांगता हूँ, मैं खून मांगता हूँ |
खो चुकी हँसी कहीं , रो रहा है देश आज ...
बुत न बन अनजान सा , तू भी उठा ले आवाज ...
ध्वनि नही चीत्कार सा ..जूनून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ , मैं खून मांगता हूँ |
मर मर के तू है जी रहा , मुर्दों के संसार में ...
चल उठ खड़ा हो वार कर , पौरुष की धार में ...
बचा ले गर्व को जो वो ..सुकून मांगता हूँ ...
मैं खून मांगता हूँ ,मैं खून मांगता हूँ |
क्रमशः ...
रेत
मैं घूमता सा बढ़ रहा था ...
झूमता सा चल रहा था ...
मरीचिका थी छल गई ...
वो रेत थी ..फिसल गई |
चमचमा रही थी वो भी ...
खिलखिला रही थी वो भी ...
सोच थी जल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
ख़ुद में धंसा लिया था मुझको ...
अपना बना लिया था मुझको ...
फ़िर चाल क्यूँ वो चल गई ?
वो रेत थी फिसल गई |
पादुकायें त्याग कर भागा ...
नीर तृष्णा में रात भर जागा ...
वो वाष्प बन निकल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
मैं निढाल हो गिर पड़ा था ...
प्राण त्याग मृत पड़ा था ...
वो सर्प बन निगल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
झूमता सा चल रहा था ...
मरीचिका थी छल गई ...
वो रेत थी ..फिसल गई |
चमचमा रही थी वो भी ...
खिलखिला रही थी वो भी ...
सोच थी जल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
ख़ुद में धंसा लिया था मुझको ...
अपना बना लिया था मुझको ...
फ़िर चाल क्यूँ वो चल गई ?
वो रेत थी फिसल गई |
पादुकायें त्याग कर भागा ...
नीर तृष्णा में रात भर जागा ...
वो वाष्प बन निकल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
मैं निढाल हो गिर पड़ा था ...
प्राण त्याग मृत पड़ा था ...
वो सर्प बन निगल गई ...
वो रेत थी फिसल गई |
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