Thursday, August 13, 2009

लक्ष्य

तू चल पड़े जो सिंह सा तो क्या धरा है क्या गगन !
डोल मदमस्त सा तू कर चिंघाड़ हो मगन |

कायरों की भीड़ में पुकारता तू हंस के चल ..
ठूंठ के इस युग्म में बढा क़दम फिर मचल |

मृत्यु एक सोम है बस प्रश्न है कि कब पिए ?
ये नहीं कितना जिये ..ये है कि कैसे जिये ?

खुद को मारना बदल के उठ प्रचंड तू निकल ..
मर रहा है क्या असंख्य मौत पूछता है पल ?

हर कोई है जी रहा तो जीने में क्या बात है ?
कर सफल जो जन्म को तो वो सत्य प्रसाद है |

आज गर तू छुप गया तो कायर ही कहलायेगा ..
नरमुंड हैं पड़े तू भी एक बन जाएगा |

शस्त्र उठा युद्ध कर , परिणाम से तू अब न डर ...
विजयी हो बन अजर या शहीद हो तू बन अमर |

Thursday, July 9, 2009

जन्म

चन्द्र की आभा लिए ...
स्वर्ग से उतरा कोई ...
नन्हा सा एक सौंदर्य ...
क्षितिज में बिखरा कहीं ... |

वो मासूमियत की ताल पर ...
है स्वर अनोखा दे रहा ...
वो दिव्य दीप की चमक में ...
बन स्फटिक प्रेम ले रहा ..|

लो खिलखिलाहट आ गयी ...
रुदन के उस खेल में ...
लो जगमगाहट छा गयी ...
उस दिव्यता के मेल में ...|

सूक्ष्म में भी सूक्ष्म है ...
जो इंगित करता जन्म है ...
उस उर की विशालता का ...
भान किन्तु आजन्म है .. |

सबमें वो जुडा हुआ है ...
सबमें वो मुडा हुआ है ...
एक सांस का प्रतीक है ...
एक अमरता का गीत है |

वो अजन्मा आज जन्मा ..
देख प्रकृति हंस रही है ..
नेकी मन में प्रफुल्लित होती ..
बदी भूतल धंस रही है |

अद्भुत सा प्रताप है ...
जो चहुँ ओर छाया है ...
एक बार फिर मुरली बजाने ...
देखो कान्हा आया है |

Thursday, June 18, 2009

शौर्य ...

वायु के समान जो ...
प्रचंड हो के चल रहा ..
मदमस्त गज की चाल में ..
बन प्रलय जो टल रहा ...

जो शेर की चिंघाड़ से ...
है चीरता वो चुप सा वन ...
जो खड्ग के प्रहार से ...
है भेदता वो भीरु मन ...

है रूप में चमक कहीं ...
है बात में खनक कहीं ...
नीड़ की उस टोह में ...
जो कर चले धमक कहीं ...

वो शौर्य का प्रतीक हैं ...
वो शहीदों का गीत है ...
मन से गर जो लड़ उठे तो ..
हार में भी जीत है ...

वो विजय का प्रमाण है ...
वो लक्ष्य भेदी बाण है ...
वो लहू का अभिमान है ...
वो मुकुटमणि की शान है ...
वो वीरता का दंभ है ...
वो अचल अटूट खम्ब है ..
वो कर्म से महान है ...
वो विश्व रूप ज्ञान है ...

उस शास्त्र को ..
उस अस्त्र को ...
प्रवीणता का भान है ...
तत्त्व का भी ज्ञान है ...
अंतिम ये प्रमाण है ..
कि वीर ही महान है ..
धीर ही महान है ...
गर्व ही महान है ...
शौर्य ही महान है |

Thursday, June 4, 2009

तत्त्व ...

कुछ नया सा ..ख्वाब सा ...
एक सत्व के आभास सा ...
एक भक्त की अरदास सा ..
एक भ्रमर के परिहास सा ..

एक नूर के आनंद सा ...
एक सुखमयी सानंद सा ..
एक भाव जो निर्बंध सा ..
एक सूर के उस छंद सा ...

एक जलोधि के आगोश सा ..
एक पयोधि से खरगोश सा ...
एक चेतन मन मदहोश सा ...
एक खग कलोल खामोश सा ...

एक वीणा की झंकार सा ...
एक रागों के अधिकार सा ...
एक शब्दों के संसार सा ...
एक लयबद्ध श्रृगार सा ...

एक परमाणु के से मर्म सा ...
एक मानवता के धर्मं सा ...
एक शर्माती सी शर्म सा ...
एक गीता के उस कर्म सा ...

जो तत्त्व है ...
जो सत्व है ...
जो ज्ञान है ...
संज्ञान है ...
जो द्रव्य है ..
न श्रव्य है ...
उस तेज को ...
पर सेज को ...
प्रणाम है ..
और चाह है ..
जिसको ढूंढती ...
ये राह है |

विदाई

गुपचुप बैठी वसंत देखो ..
मनुहार करता अम्बर देखो ...
दूर क्षितिज से ..
पोटली में बांधे ...
कुछ ला रहा है ..
उसके लिए ...जो जा रहा है |

पवन का वो गीत सुनो ...
पेडों का संगीत बुनो ...
जो पत्रकों की ..
सरसराहट में ..
नव राग छेड़े गा रहा है ..
उसके लिए.... जो जा रहा है |

श्वेत स्वर्ण की जगमगाहट ...
हिमगिरी की वो सुगबुगाहट ...
अपने ही अंदाज में ..
कम्पन ला रही है ...
जिसकी लय से उपजा सौंदर्य ...
देखो देवदार को ...
भा रहा है ...
उसके लिए ...जो जा रहा है |

नीर का वो सादापन ...
निर्मल, निश्छल, भोलापन ...
स्वाति नक्षत्र की उस बूँद को ...
खुद में समा कर ...
एक सीप ढूंढ ..मना कर ...
मोती उसको बना कर ...
आज ला रहा है ..
उसके लिए ...जो जा रहा है |

Thursday, May 28, 2009

अदना सा इंसान

मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
चलता फिरता ...
बर्फ का टुकडा ...
जोश में भी पिघल जाता हूँ ...
ख्वाब अपने निगल जाता हूँ ...
राह बनती है ..है तो ..फिर
दूसरी ओर निकल जाता हूँ ...

मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
मुझे डर लगता है ...
अट्टालिकाओं से !
जिसमें मेरा पसीना लगा है ...
और चार पहिये के उस इंसान से ...
जो दौड़ता है ..बरबस ...
मेरी जान लेने के लिये |

मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
पेट पर रखकर पत्थर ...
सोचता हूँ भूख मिट गयी ...
और भूल कर भी नहीं देखता सामने ...
क्या पता कोई स्वान बिस्किट खाता दिख पड़े |

मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
छुप छुप कर लकडी जला कर ...
कुछ आधी जली रोटी सेंकता हूँ ...
कुछ बड़े लोग आकर ..तोड़ देते चूल्हा मेरा ...
कहते परदुषण होगा !!!!
मैं लिपट जाता अपने चीथडो वाले कम्बल में ...
और देखता उन्हें उनकी कार में ...धुंआ उडा कर ...
पास के कारखाने के गंदे नाले के किनारे चलते हुए |

मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
मेरा बच्चा खेलता है नगरपालिका के डब्बे में ...
कुछ सभ्य से बच्चे आकर नाक बंद कर निकल जाते हैं ...
और फेंक जाते हैं टॉफी के कपडे खरे !
वो सोचता है कि कचरे के डब्बे में क्यूँ नहीं फेंका इसे ?
फिर बटोर कर उन्हें ...अपनी खेलती दुनिया में रम जाता है |

मैं एक अदना सा इंसान हूँ ....
सपने दिखाता लोगों को अपनी डुगडुगी बजाकर..
आवाज जिसकी मेरे आलावा सुनते हैं सभी ...
मैं भी सुनता हूँ लेकिन अन्तः में नहीं !
डरता हूँ जीवन तो टूट गया है ....
सपने न टूट जाएँ कहीं |

Thursday, April 9, 2009

शर्माना तेरा .....

शर्माना तेरा ...
जैसे अक्स से नजरें चुराना तेरा ...
जैसे ख्वाबों की बटिया जोह के ...
फिर तेरे घर आना मेरा |

शर्माना तेरा ...
जैसे बात बात पर बच्चे सा इतराना तेरा ..
जैसे ओस की सप्तरंग छटा में प्रातः ...
निस्तब्ध सा डूब जाना मेरा |

शर्माना तेरा ...
जैसे उस अदा से नजरें झुकाना तेरा ..
जैसे नए साज को खोजता ...
वो टूटा ढोलक पुराना मेरा |

शर्माना तेरा ....
जैसे उस हंसी को अधरों में छिपाना तेरा ...
जैसे बोलने की हसरत दिल में लिए ...
हर एक शब्द भूल जाना मेरा |

शर्माना तेरा ...
जैसे उँगलियों से लट को उलझाना तेरा ...
जैसे उस लट को छूने की कोशिश में ...
हाथ से हाथ को दबाना मेरा |

शर्माना तेरा ...
जैसे भाल में सिलवटें पड़ जाना तेरा ...
जैसे तरंगिनियों के मेले में विस्मित ...
तुझ पर मर जाना मेरा |

शर्माना तेरा ...
जैसे एक कायनात के जन्म का फ़साना तेरा ...
जैसे तुझे पाने की आस में ...
प्रकृति सा शिशु बन जाना मेरा |

~वैभव