Saturday, November 9, 2019

जिंदगी













पत्थर बनाने की कोशिश बहुत की ज़ालिम ने
मैं दरिया के पास था ,
 बस पिघल गया !

यूँ तो रोक लेता था खुद को मारकर हर शाम
वो शाम गुलाबी थी ,
 मन मचल गया !

मुझे देवता बनाने का शौक था अय्यारों को
महफ़िल सजी रह गयी ,
मैं निकल गया !

मैं चट्टानों के मानिंद खड़ा रहा तूफानों में
किसी की चुनरी लहरायी ,
 बस बिखर गया !

तारीफों के बोझ में दबा हुआ जिस्म मेरा 
किसी ने गाली दी ,
यूँ ही निखर गया |

चलता रहा अंधेरों में बेख़ौफ़ गाते हुये
उस गली में बहुत उजाला था,
 मैं सिहर गया |

हथियारों के साथ चलता रहा भीड़ में
मुझे काज़ी बना दिया
मैं सुधर गया |

लड़ पड़े थे लाश को लेकर मज़हब दोनों
वो कबीरा था
पता नहीं किधर गया |

दस रास्तों में बस एक रास्ता अनजान था
मुझे खुद को ढूँढना था
मैं उधर गया |

Sunday, April 28, 2019

आम

चलो आम खाते हैं 
मीठे मीठे आम चुस्कियों से भरे
मुझको तुमको ताकते खड़े खड़े
लेकर एक झोला हंसिया कंटीला सा 
तोड़ लाते हैं
चलो आम खाते हैं !

डर क्यूँ रहे हो ?
मिट्टी में ज़हर थोड़ी भरा है 
जमीन सूख रही तो क्या 
आम देखो बिल्कुल हरा है !
मिट्टी में थोड़ा सा पानी छिड़क कर 
पैरों से दबाते हैं
चलो आम खाते हैं !

ये बाग किसका है हमें नही पता 
अब भूख लग आयी तो हमारी क्या खता ?
वैसे भी सुना है मालिक इसका बेदम है
उसके बाग में क्या , 
उसके तो घर में भी पानी कम है !
थोड़ी दूर ही हरा मैदान है पानी से लबालब
रविवार है उसे देख आते हैं 
चलो आम खाते हैं !

ये आम पीला है कि हरा है ?
कोई कह रहा है अंदर केसरी रंग भरा है !
ऐसा करते हैं कि रंगों को अलग कर देते हैं 
तुम पीला ले लो हम हरा ले लेते हैं 
देखते हैं कि किसका आम ज्यादा खट्टा है
किसमें चीनी है किसमें मट्ठा है ?
खट्टे आम का हम क्या करेंगे ?
इकट्ठा करो विदेश भेज आते हैं
चलो आम खाते हैं !

सोच रहे हैं आमरस पी लिया जाये 
इतनी गरमी है 
थोड़ा जी भर के जी लिया जाये
पर आमरस बनाने आयेगा कौन ?
आ भी गया तो आमरस बनायेगा कौन ?
इस गाँव के सभी लोग नाकारा हैं 
इनको मशीनें दी थी पिछले साल 
लगता है मशीनें ही आवारा हैं 
छोड़ो साहब थोड़े पैसे बचा जाते हैं 
चलो आम खाते हैं !

ओह आम में कीड़ा लग गया है !
पिछले साल तो नई गुठलियां डाली थी 
ये पेड़ की डाली तो चमकने वाली थी !
पता नहीं क्या हुआ ..
पास की छोटी घास मर गयी है 
नया मिनरल वाटर भी तो आया था
शायद उससे डर गयी है !
एक दो डाली तो बची हैं चकाचक
थोड़ा आराम फरमाते हैं 
चलो आम खाते हैं 

सुना यहाँ कल रात को चोरी होने वाली थी ?
हमने भी निशाना लगा के गुलेल मारी थी
पर अंधेरा था पता नही लगी न लगी 
चिड़िया मगर इस पेड़ पर देख के ये सब 
रात भर जगी !
चिड़िया तो भोली है 
इनकी भी टोली है 
इनको गुलेल दिखा लाते हैं
चलो आम खाते हैं !

शायद ये आम सड़ गया है 
पानी , मिट्टी , खाद , धूप कुछ न मिला 
हम तो मगर आज़ाद हैं हमे क्या गिला 
कीड़े लग गये तो लगने दो 
भौंरे जग गये तो जगने दो
रसहीन हो जाने दो इस आम को
भूखा मरने दो तमाम को
हमें चिंता नहीं 
हमारे आम बिदेशों से आते हैं
चलो आम खाते हैं !

Sunday, February 10, 2019

चीख़

चुप रहने की कोशिश है हर तरफ़ 
भीड़ पीछे हट रही है 
वो अकेला आगे बढ़ रहा है
उसकी जीभ कट रही है 

हामी भरने की क़वायद में 
इंसान गायब हो रहे हैं 
कंकालों से भरा है तालाब
मेढक साहब हो रहे हैं 

सुबह सवेरे चल पड़ती है मशीन 
हर पुर्जा जोरदार आवाज करता है 
आवाज़ शायद सुन ले खरीदने वाला
सोचकर वो हर रात मरता है 

अकेलेपन से डरता है खौफजदा हो 
भीड़ के साथ दौड़ने लगता है 
दोनों हाथों से पकड़ कर हड्डी रीढ़ की
पूरी शिद्दत से मोड़ने लगता है 

पिघल जाता है लोहा लम्हों में 
ढलकर औजार बन जाता है 
काट देता है दूसरे लोहे को 
बेरहम हथियार बन जाता है 

बेइंतहां डर को सीने में लिये 
सिमट कर सोने लगा है 
हंसता मुस्कुराता दिन बिताता 
अंधेरों में रोने लगा है 

जीभ की परवाह हो गयी उसे 
जिगर की खबर नहीं रही है 
वैसे भी इस उत्तराधुनिक युग मे
ये भी सही है , वो भी सही है 

भूल गया कि केवल आँखे भी 
काफ़ी हैं जी भर बोलने के लिये
भूल गया कि केवल साँसें भी 
काफी हैं किसी के डोलने के लिये 

भूल गया कि आवाज उठाने के लिये
दूसरे पाले में झपट्टा मारना जरूरी है
जीत की गुंजाइश कहीं कभी बाकी रहे 
इसलिये बेख़ौफ़ हो हारना जरूरी है 

याद उसको आ गया जो ये नज़ारा 
टूट के चमकेगा फ़िर से वो सितारा
जीभ लंबी हो के रस्सी बन सकेगी 
फांद बन जायेगा कोमल ये नजारा
थरथरा जायेंगे हुक्मरानों के घर 
साथ उसके तुमने गर जो दहाड़ा 
एक उसकी लाश पर ही बन सकेगा 
हर पहर आज़ाद बागी घर तुम्हारा 
हर पहर आज़ाद बागी घर तुम्हारा

Tuesday, March 20, 2018

किरदार

















मुझे जानने की ख्वाहिश बहुतों ने की
उनको पता नहीं था ..
मैं किरदार में हूँ !

मेरा किरदार अनोखा है
खुद से जुदा
खुद पर फ़िदा
देखता सबको
देखता ख़ुद को !
और हंस देता बेमतलब सा 
बेमतलब की बातों पर |
हंसाता रुलाता छिपाता सजाता
मेरा किरदार वादे निभाता
कुछ को समझ आता
कुछ को खटक जाता !
सुनकर ख़ामोश सोचता
मैं किरदार में हूँ !

कुछ चेहरे हैं , कुछ हैं मुखौटे
सिक्के चमक रहे हैं खोटे खोटे
वो भी तो किरदार हैं
वो भी असरदार हैं
फिर लड़ाई किरदारों की है ?
या मेरी तुम्हारी !
किरदार जान नहीं पायेंगे
पहचान नहीं पायेंगे
कोशिश तो करेंगे
शायद पहचान भी लें
पर मान नहीं पायेंगे !
मैं भी क्यूँ मानूँ ?
मैं तो किरदार में हूँ !

मेरा प्रेम भी किरदारों वाला है
तुमने भी तो शौक़ पाला है ?
सपने जिंदगी को मात दे रहे हैं
किरदार आग को आँच दे रहे हैं
डर क्यूँ रहे हो ?
तुम्हारी भी तो केंचुली है !
किरदारों की शोख़ी
विरासत में मिली है |
ये देख रहे हो न समाज !
इसका भी किरदार है
कभी मंदिर है कभी मस्जिद है
और कभी लुटता बाजार है !
तो आओ कुछ खरीदें यहाँ से
प्रेम , द्वेष , दया , हिंसा
सब मिलता है यहाँ |
कीमत बदल जाती है पर
किरदार देखकर !
तो बदल लेना तुम भी किरदार
दुकान देखकर !
मैंने तो मुफ्त में लिया है सब कुछ
मैं तो किरदार में हूँ |

कभी कभी जब खामोश सोता हूँ
तो अपने किरदार में नहीं होता हूँ
देख नहीं पाता खुद को तब !
तुम भी नहीं देख पाओगे
कितने शीशे लाओगे ?
आदमी नंगा होता है
अपने किरदार के बिना !
पता है तुम्हें
संभल नहीं पाओगे |
तो अपने किरदार में रहो
आँखे बंद करो
और कहीं दूर तक बहो
जहाँ एक गाँव नया है
और वहाँ भी हवा चल रही है 
नये नये किरदारों की !
मुझे ढूँढ रहे हो ?
नहीं मिलूंगा !
मैं किरदार में हूँ  |



Monday, January 16, 2017

सभ्यता और समय 















समय की चाल पर खेलता
खंडहरों का हुजूम
और खंडहर हो जाता है
देखता अगर खुद को आईने में
बेसबर हो जाता है !

अंतहीन जीवन की कल्पना
स्वयंभू का अस्तित्व खोजता
मानव गढ़ता है राजमहल
होती है चहल पहल
चंद पलों की ...
और पल अगला निगल जाता है
पुराने पल को !
ठिठकती सभ्यतायें देखती
इस सतत छल को !

अदना सा मानव देखता
खुद को विजयी होते
सागर , पर्वत , व्योम
कितने छोटे लगते !
लेकिन भान नहीं है
धरती के गर्भ का ?
या फिर भान अधिक है
स्वयं के दर्प का ?
लावा निकलता कभी गर्भ से
कभी अपने अंदर छुपे दर्प से
और लुहलुहान होकर आखिर
बदल जाती है सभ्यता !
जिसे देखने आती नयी सभ्यता
अपना नया दर्प लेके !

ये पहिया चलता जाता है
घूम कर फिर वहीँ वहीँ आता है
बीच में कुछ अस्तित्वहीन धूलि कण
कर देते हैं अपने काल्पनिक युग का निर्माण
जिसे अगले चक्र में पहिये के नीचे आना है
जिसे अपना वजूद खुद ही मिटाना है !!


Sunday, May 15, 2016

शिक्षक शिक्षकों से ....


मैं शिक्षक हूँ मैं शिक्षा की कुछ बात बताने आया हूँ
मैं अध्यापक का नया नवेला अर्थ सुनाने आया हूँ ।

मेरी छोटी सी विनती है कि शिक्षा को समझे बुझेँ
मेरा अपना जो अनुभव है , मैं उसे साथ में लाया हूँ ।

शिक्षा क्या है ?
चंद किताबें !
जिनमे बस कुछ अक्षर होते
और कुछ मनमानी सी बातें ?
यही अगर बस शिक्षा है तो
शिक्षक का कोई मोल नहीं
उसकी अपनी कोई सोच नहीं
उसके अपने कोई बोल नहीं !

शिक्षा का बस मर्म यही है
सही गलत का भेद सिखाओ
रोबोट किताबी नहीं चाहिये
एक अच्छा इंसान बनाओ ।

कौतुहल है बच्चों में तो
तुम सबसे अच्छे अध्यापक हो
प्रश्न वहाँ से जितने आयें
उतना तुम मुस्काते जाओ
क्यूंकि कौतूहल में ही तो
नये विश्व का राज छुपा है
बच्चों की विस्मित आँखों में
ऊँचा उड़ता सा बाज़ छुपा है ।

उस बाज़ को हमें उड़ाना है
उसके पंखो की ताकत से
आसमान ये संवरेगा
उसकी आँखों की ताकत से
आसमान ये देखेगा ..
एक नया जमाना
नया तराना
दुनिया का
जिसके निर्माता शिक्षक हैं ।

शिक्षक जब शिक्षक न होकर
दोस्त बने इन बच्चों के
तो समझूंगा कि तुमने
शिक्षा को पूरा समझा है
और पूरा ही समझाया है
इन प्यारे प्यारे बच्चों को ।

और केवल बस पढ़ाते रहना
नहीं है पूरा  काम हमारा
प्रश्न पूछना अपने से   ...
हम कितना सीखे हैं हर दिन
कितना और सीखना है ?
कितनी मेहनत करनी है ?
कितना और सींचना है ?
तब जाके इन प्यारे पौधों
को पानी दे पाओगे
इन्हे सींचकर अपने श्रम से
हरा भरा कर पाओगे
नहीं तो फिर ये सूखेंगे
और तुम भी मुरझाओगे ।

शिक्षक ऐसा दर्पण है
जिसमे अपने चेहरा देखें
बच्चे हरपल हँसते हँसते
जैसा दर्पण वैसा चेहरा
जैसी चालें वैसा मोहरा
मोहरों को हर मुश्किल में
लड़ते रहना सिखलाना है
खुद ही बन के नयी प्रेरणा
बच्चों को दिखलाना है
तभी तो कुछ दे पाओगे
अपने में से बच्चों को
तभी तो कुछ कह पाओगे
इन सब मन के सच्चों को ।

ये माटी जैसे कच्ची कच्ची
ज्यूँ ढालोगे ढल जाएंगे
तुम बस थोड़ा हाथ लगाओ
नये नये बन जाएंगे
और जो तुम इनसे भागोगे
तो शिक्षा का क्या अर्थ रहा ?
ये शिक्षा केवल शब्द नहीं है
एक पूरा आंदोलन है

तुम गांधी हो आंदोलन के
तुम्हे आज़ादी अब लानी है
एक ऐसी फ़ौज बनानी है
जो सत्य अहिंसा के रस्ते में
चलके अपनी मंजिल पाये
रामानुजम के साथ चले
और रमन से हाथ मिलाएं
ग़ालिब से अल्फाज़ लिखें
विश्वेसरैया का मान बढ़ायें

तभी गर्व से कह सकते हो
शिक्षक हूँ मैं शिक्षक हूँ
कर्मो का और मूल्यों का
मैं इकलौता रक्षक हूँ ।

तुम गर ये कर सको तो
मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगा
शिक्षक था मैं शिक्षक हूँ मैं
गर्व से अपने बाद कहूंगा ।

Sunday, May 8, 2016

माँ




एक चाबी जैसे गुड्डे की तरह
बेफिक्र हो लगातार हर पल
जो चलती चली जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जो घर में मिठाई आती है
तो उसका क पेट भरा होता है
क्यूंकि बच्चे का मन हरा होता है
और उसको खिलाते वो मिठाई
अपनी आँखों से खाती है
वो माँ कहलाती है ।

ओढ़कर जब तुम चादर कहीं
सपनो में जी रहे होते हो
जो बुनकर एक कंबल नया
तुमको चुपके से ओढ़ा जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जिस स्वेटर को समझकर पुरानी
फेंक देते हो नयी चीजों के लिए
उसके रेशों में भर प्यार का शहद
एक नयी चाशनी बनती है
वो माँ कहलाती है ।

थक कर कभी जब सोती है
तुम्हारे जगने की रात होती है
कैसे नींद आये उसे !
थपकियों से कहानियो से
कोशिश करती
अपनी नींद भूल कर !
तुमको फिर जो सुलाती है
वो माँ कहलाती है ।

जाते हुये बलायें लेती
रो पड़ती तुम्हारे लिए
जाना तुम्हे होता है
जान उसकी जाती है
वो माँ कहलाती है ।

भागती जिंदगी में कदम तुम्हारे
बढ़ते चले जाते हैं
और थक जाते हो जब कभी
तो याद फिर आती है !
याद ! जो ठहरना सिखाती है
वो माँ कहलाती है ।

एक खांसी पर तुम्हारी
वो सर पे उठा लेती है आसमां
और वक़्त आने पर
लड़ भी लेती है वक़्त से
तुम्हारे लिए !
तुम्हे जिंदगी दे जाती है
वो माँ कहलाती है ।

तवे से उतार के रोटी में
प्यार गूंथकर देती है
तुम कुछ खा के
कुछ बचा के
खेलने चले जाते हो
फिर वो बासी रोटी
जिसके काम आती है
वो माँ कहलाती है ।

कभी कभी डांट कर तुम्हे
किचन के उस कोने में
चुपके चुपके रोती है
डांटना पड़ता है उसे
तुमको इंसान बनती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारे वादों पर हंसती
जो तुम तोड़ देते हो नयी सुबह
जिंदगी की हर सांझ में
अपना वादा निभाती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारी फ़िक्र में सूखती है
झुर्रियों के बीच कहीं
अपना ध्यान कहाँ उसे ?
अपनी फिक्र कहाँ  कर पाती है !
वो माँ कहलाती है ।

तुम बड़े हो जाते हो जल्दी !
ऊँचे भी !
देख नहीं पाते पीछे !
और नीचे भी !
वो बस आंसुओं में
घिरी रह जाती है ।
वो माँ कहलाती है ।

तुम उसका जीवन होते हो
वो तुम्हारा पुराना पंखा !
आवाज करती है न ?
पसंद नहीं आती !
याद करो कभी तुम्हारे रोने में !
तुम्हारी जिद में !
एक मतलब ढूंढ लेती थी !
आज भी कोशिश करती
पर तुम बड़े हो गए हो
बेचारी समझ नहीं पाती है
वो माँ कहलाती है ।