जा रहा है पंछी एक ,
बनाने अपने घरौंदे अनेक ...
उजला सा ..नन्हा सा ...
भीड़ में तन्हा सा ..
स्वप्न में खोया ...
दिल में रोया ..
नीर तृष्णा का आभास ..
मंजिल की प्यास ...
मन में लिए ..
तन में लिए ...
उड़ चला ..आशियाने में ...
अनजाने से ठिकाने में ..
दूर उस ठूंठ से ...हुआ जैसे ...
पता नहीं कैसे ...
मुड़ा पीछे ..और ..
कुछ यादें ..कुछ बातें ...
कुछ हंसी ..कुछ ठट्टे ..
कुछ रूठना ..कुछ एंठना ..
कुछ सताना ...कुछ मनाना ..
कुछ बताना ..कुछ छिपाना ..
दो साल ऐसे बिताना ...
जिसमें...
जीवन की लचक ...
सर्वस्व की खनक ...
आनंद की ठनक ..
मस्ती की छनक ..
पागल सी सनक ..
उजला सा कनक ...
प्यारी सी भनक ..
अपने अन्दर समाया हुआ ...
वो तरु विस्मित ...
नेत्र खोले हंस रहा है ..
रो रहा है ..
नव बीज कल्पित ..
बो रहा है ...
क्यूंकि यही नियम है ..
प्रकृति का ..जिसमें ..
सुन्दर आकृति को ..
बिगड़ना पड़ता है ...
नए सृजन नयी रचना के लिए ...
जो हमेशा ज्यादा सुन्दर होती है |
ऐसे ही तो जीवन चलता है ..
ऐसे ही तो सूर्य उगता है ...
निशा की गोद में आत्मसमर्पण कर ...
प्रातः पुनः लालिमा बिखेरने के लिए |
तरु से दूर जाने पर मन उदास है ...
और उससे भी ज्यादा ..
कुछ खग विहग हैं ..
मेरे प्रतिबिम्ब ...
जिनके साथ खेला ..
जीवन का मेला ..
हंसा रोया गाया पाया ..
स्नेह ..प्रेम ..और अर्पण मैं ..
कुछ भी न कर पाया ..!
लेकिन भाव से ...कामना है ..
सुखद सौंदर्य की ...
सबके जीवन में ...
हंसी ठिठोली ..का ...
साम्राज्य हो ...|
फूलता रहे तरु और साथ उसके ...
निवासी भी ..
मिलने की आस लिए ..
एक पल ठिठकता ...
हँसता रोता ...
फिर जा रहा है ...
वो विहग...
एक नया तरु खोजने ..
जिसकी शाखों पर बैठकर ...
वो पुराने तरु को याद कर सके |
~वैभव
Thursday, September 10, 2009
Wednesday, August 26, 2009
पत्र का प्रेम
ओस बिंदु की अंगडाई देख ..
पत्र स्तब्ध हो कहने लगा ..
"प्रतिबिम्ब की शुद्धता हो " !
या पारदर्शिता की स्निग्धता ?
मैं मृतप्राय सा पड़ा था ...
निशा की गोद में ..
तुम्हारी राह में ..
जगा हुआ था !
तुम शायद आई थी ..
वही पवित्रता की मूर्ति ...
तन मन कंपाते हुए ...
ह्रदय में छाई थी |
मैं सत्य असत्य की दुविधा में ...
स्वप्न मंजरी में मगन हुआ ..
निशा के आँचल में छुपा ..
संदेह और सघन हुआ |
फिर भी मुझे आभास था ...
परिस्थिति का , उपस्थिति का !
इसीलिए थाम लिया था ...
एक सच्चा प्रयास था .. |
सहसा एक खनक सी ..
वायु की धमक सी,
तुम्हारा अस्तित्व मिटाने ..
आई पवन छनक सी |
मैं शांत धैर्य से क्रूर हुआ ...
द्विगुणित हो छत्र बन..
तुम्हारे चहुँ ओर लिपट गया ...
बिना छुए ! तुम सहम गयी !
थपेडों से लड़ मैंने ..
खुद को बस मिटा दिया था ...
जर्जर था पर था कितना खुश ..
तुम्हारा शील बचा लिया था |
प्राण प्रयाण होने को व्याकुल ..
मैंने कुछ पल मांग लिए थे ...
रवि की किरण को पुकार रहा था ...
आये तुम्हें आत्मसात करे |
हे तरंगिनी-भानु की संतान |
मैं अब जा रहा हूँ ..
घायल हो चुका हूँ ...
लेकिन मन में संतोष लिए |
तुम्हें बस ये बताना है ..
प्रेम बहुत है मेरे मन में ..
किन्तु त्याग है ज्यादा शायद !
पाने के भाव का परित्याग किये |
सदियों से मैं लड़ता आया ...
सदियों तक मैं लड़ता रहूँगा ...
बस तुम कुछ पल मेरे आगोश में यूँ ही बिता कर ...
सरिता रवि से सजे अपने घर में चले जाना |
पत्र स्तब्ध हो कहने लगा ..
"प्रतिबिम्ब की शुद्धता हो " !
या पारदर्शिता की स्निग्धता ?
मैं मृतप्राय सा पड़ा था ...
निशा की गोद में ..
तुम्हारी राह में ..
जगा हुआ था !
तुम शायद आई थी ..
वही पवित्रता की मूर्ति ...
तन मन कंपाते हुए ...
ह्रदय में छाई थी |
मैं सत्य असत्य की दुविधा में ...
स्वप्न मंजरी में मगन हुआ ..
निशा के आँचल में छुपा ..
संदेह और सघन हुआ |
फिर भी मुझे आभास था ...
परिस्थिति का , उपस्थिति का !
इसीलिए थाम लिया था ...
एक सच्चा प्रयास था .. |
सहसा एक खनक सी ..
वायु की धमक सी,
तुम्हारा अस्तित्व मिटाने ..
आई पवन छनक सी |
मैं शांत धैर्य से क्रूर हुआ ...
द्विगुणित हो छत्र बन..
तुम्हारे चहुँ ओर लिपट गया ...
बिना छुए ! तुम सहम गयी !
थपेडों से लड़ मैंने ..
खुद को बस मिटा दिया था ...
जर्जर था पर था कितना खुश ..
तुम्हारा शील बचा लिया था |
प्राण प्रयाण होने को व्याकुल ..
मैंने कुछ पल मांग लिए थे ...
रवि की किरण को पुकार रहा था ...
आये तुम्हें आत्मसात करे |
हे तरंगिनी-भानु की संतान |
मैं अब जा रहा हूँ ..
घायल हो चुका हूँ ...
लेकिन मन में संतोष लिए |
तुम्हें बस ये बताना है ..
प्रेम बहुत है मेरे मन में ..
किन्तु त्याग है ज्यादा शायद !
पाने के भाव का परित्याग किये |
सदियों से मैं लड़ता आया ...
सदियों तक मैं लड़ता रहूँगा ...
बस तुम कुछ पल मेरे आगोश में यूँ ही बिता कर ...
सरिता रवि से सजे अपने घर में चले जाना |
Thursday, August 13, 2009
लक्ष्य
तू चल पड़े जो सिंह सा तो क्या धरा है क्या गगन !
डोल मदमस्त सा तू कर चिंघाड़ हो मगन |
कायरों की भीड़ में पुकारता तू हंस के चल ..
ठूंठ के इस युग्म में बढा क़दम फिर मचल |
मृत्यु एक सोम है बस प्रश्न है कि कब पिए ?
ये नहीं कितना जिये ..ये है कि कैसे जिये ?
खुद को मारना बदल के उठ प्रचंड तू निकल ..
मर रहा है क्या असंख्य मौत पूछता है पल ?
हर कोई है जी रहा तो जीने में क्या बात है ?
कर सफल जो जन्म को तो वो सत्य प्रसाद है |
आज गर तू छुप गया तो कायर ही कहलायेगा ..
नरमुंड हैं पड़े तू भी एक बन जाएगा |
शस्त्र उठा युद्ध कर , परिणाम से तू अब न डर ...
विजयी हो बन अजर या शहीद हो तू बन अमर |
डोल मदमस्त सा तू कर चिंघाड़ हो मगन |
कायरों की भीड़ में पुकारता तू हंस के चल ..
ठूंठ के इस युग्म में बढा क़दम फिर मचल |
मृत्यु एक सोम है बस प्रश्न है कि कब पिए ?
ये नहीं कितना जिये ..ये है कि कैसे जिये ?
खुद को मारना बदल के उठ प्रचंड तू निकल ..
मर रहा है क्या असंख्य मौत पूछता है पल ?
हर कोई है जी रहा तो जीने में क्या बात है ?
कर सफल जो जन्म को तो वो सत्य प्रसाद है |
आज गर तू छुप गया तो कायर ही कहलायेगा ..
नरमुंड हैं पड़े तू भी एक बन जाएगा |
शस्त्र उठा युद्ध कर , परिणाम से तू अब न डर ...
विजयी हो बन अजर या शहीद हो तू बन अमर |
Thursday, July 9, 2009
जन्म
चन्द्र की आभा लिए ...
स्वर्ग से उतरा कोई ...
नन्हा सा एक सौंदर्य ...
क्षितिज में बिखरा कहीं ... |
वो मासूमियत की ताल पर ...
है स्वर अनोखा दे रहा ...
वो दिव्य दीप की चमक में ...
बन स्फटिक प्रेम ले रहा ..|
लो खिलखिलाहट आ गयी ...
रुदन के उस खेल में ...
लो जगमगाहट छा गयी ...
उस दिव्यता के मेल में ...|
सूक्ष्म में भी सूक्ष्म है ...
जो इंगित करता जन्म है ...
उस उर की विशालता का ...
भान किन्तु आजन्म है .. |
सबमें वो जुडा हुआ है ...
सबमें वो मुडा हुआ है ...
एक सांस का प्रतीक है ...
एक अमरता का गीत है |
वो अजन्मा आज जन्मा ..
देख प्रकृति हंस रही है ..
नेकी मन में प्रफुल्लित होती ..
बदी भूतल धंस रही है |
अद्भुत सा प्रताप है ...
जो चहुँ ओर छाया है ...
एक बार फिर मुरली बजाने ...
देखो कान्हा आया है |
स्वर्ग से उतरा कोई ...
नन्हा सा एक सौंदर्य ...
क्षितिज में बिखरा कहीं ... |
वो मासूमियत की ताल पर ...
है स्वर अनोखा दे रहा ...
वो दिव्य दीप की चमक में ...
बन स्फटिक प्रेम ले रहा ..|
लो खिलखिलाहट आ गयी ...
रुदन के उस खेल में ...
लो जगमगाहट छा गयी ...
उस दिव्यता के मेल में ...|
सूक्ष्म में भी सूक्ष्म है ...
जो इंगित करता जन्म है ...
उस उर की विशालता का ...
भान किन्तु आजन्म है .. |
सबमें वो जुडा हुआ है ...
सबमें वो मुडा हुआ है ...
एक सांस का प्रतीक है ...
एक अमरता का गीत है |
वो अजन्मा आज जन्मा ..
देख प्रकृति हंस रही है ..
नेकी मन में प्रफुल्लित होती ..
बदी भूतल धंस रही है |
अद्भुत सा प्रताप है ...
जो चहुँ ओर छाया है ...
एक बार फिर मुरली बजाने ...
देखो कान्हा आया है |
Thursday, June 18, 2009
शौर्य ...
वायु के समान जो ...
प्रचंड हो के चल रहा ..
मदमस्त गज की चाल में ..
बन प्रलय जो टल रहा ...
जो शेर की चिंघाड़ से ...
है चीरता वो चुप सा वन ...
जो खड्ग के प्रहार से ...
है भेदता वो भीरु मन ...
है रूप में चमक कहीं ...
है बात में खनक कहीं ...
नीड़ की उस टोह में ...
जो कर चले धमक कहीं ...
वो शौर्य का प्रतीक हैं ...
वो शहीदों का गीत है ...
मन से गर जो लड़ उठे तो ..
हार में भी जीत है ...
वो विजय का प्रमाण है ...
वो लक्ष्य भेदी बाण है ...
वो लहू का अभिमान है ...
वो मुकुटमणि की शान है ...
वो वीरता का दंभ है ...
वो अचल अटूट खम्ब है ..
वो कर्म से महान है ...
वो विश्व रूप ज्ञान है ...
उस शास्त्र को ..
उस अस्त्र को ...
प्रवीणता का भान है ...
तत्त्व का भी ज्ञान है ...
अंतिम ये प्रमाण है ..
कि वीर ही महान है ..
धीर ही महान है ...
गर्व ही महान है ...
शौर्य ही महान है |
प्रचंड हो के चल रहा ..
मदमस्त गज की चाल में ..
बन प्रलय जो टल रहा ...
जो शेर की चिंघाड़ से ...
है चीरता वो चुप सा वन ...
जो खड्ग के प्रहार से ...
है भेदता वो भीरु मन ...
है रूप में चमक कहीं ...
है बात में खनक कहीं ...
नीड़ की उस टोह में ...
जो कर चले धमक कहीं ...
वो शौर्य का प्रतीक हैं ...
वो शहीदों का गीत है ...
मन से गर जो लड़ उठे तो ..
हार में भी जीत है ...
वो विजय का प्रमाण है ...
वो लक्ष्य भेदी बाण है ...
वो लहू का अभिमान है ...
वो मुकुटमणि की शान है ...
वो वीरता का दंभ है ...
वो अचल अटूट खम्ब है ..
वो कर्म से महान है ...
वो विश्व रूप ज्ञान है ...
उस शास्त्र को ..
उस अस्त्र को ...
प्रवीणता का भान है ...
तत्त्व का भी ज्ञान है ...
अंतिम ये प्रमाण है ..
कि वीर ही महान है ..
धीर ही महान है ...
गर्व ही महान है ...
शौर्य ही महान है |
Thursday, June 4, 2009
तत्त्व ...
कुछ नया सा ..ख्वाब सा ...
एक सत्व के आभास सा ...
एक भक्त की अरदास सा ..
एक भ्रमर के परिहास सा ..
एक नूर के आनंद सा ...
एक सुखमयी सानंद सा ..
एक भाव जो निर्बंध सा ..
एक सूर के उस छंद सा ...
एक जलोधि के आगोश सा ..
एक पयोधि से खरगोश सा ...
एक चेतन मन मदहोश सा ...
एक खग कलोल खामोश सा ...
एक वीणा की झंकार सा ...
एक रागों के अधिकार सा ...
एक शब्दों के संसार सा ...
एक लयबद्ध श्रृगार सा ...
एक परमाणु के से मर्म सा ...
एक मानवता के धर्मं सा ...
एक शर्माती सी शर्म सा ...
एक गीता के उस कर्म सा ...
जो तत्त्व है ...
जो सत्व है ...
जो ज्ञान है ...
संज्ञान है ...
जो द्रव्य है ..
न श्रव्य है ...
उस तेज को ...
पर सेज को ...
प्रणाम है ..
और चाह है ..
जिसको ढूंढती ...
ये राह है |
एक सत्व के आभास सा ...
एक भक्त की अरदास सा ..
एक भ्रमर के परिहास सा ..
एक नूर के आनंद सा ...
एक सुखमयी सानंद सा ..
एक भाव जो निर्बंध सा ..
एक सूर के उस छंद सा ...
एक जलोधि के आगोश सा ..
एक पयोधि से खरगोश सा ...
एक चेतन मन मदहोश सा ...
एक खग कलोल खामोश सा ...
एक वीणा की झंकार सा ...
एक रागों के अधिकार सा ...
एक शब्दों के संसार सा ...
एक लयबद्ध श्रृगार सा ...
एक परमाणु के से मर्म सा ...
एक मानवता के धर्मं सा ...
एक शर्माती सी शर्म सा ...
एक गीता के उस कर्म सा ...
जो तत्त्व है ...
जो सत्व है ...
जो ज्ञान है ...
संज्ञान है ...
जो द्रव्य है ..
न श्रव्य है ...
उस तेज को ...
पर सेज को ...
प्रणाम है ..
और चाह है ..
जिसको ढूंढती ...
ये राह है |
विदाई
गुपचुप बैठी वसंत देखो ..
मनुहार करता अम्बर देखो ...
दूर क्षितिज से ..
पोटली में बांधे ...
कुछ ला रहा है ..
उसके लिए ...जो जा रहा है |
पवन का वो गीत सुनो ...
पेडों का संगीत बुनो ...
जो पत्रकों की ..
सरसराहट में ..
नव राग छेड़े गा रहा है ..
उसके लिए.... जो जा रहा है |
श्वेत स्वर्ण की जगमगाहट ...
हिमगिरी की वो सुगबुगाहट ...
अपने ही अंदाज में ..
कम्पन ला रही है ...
जिसकी लय से उपजा सौंदर्य ...
देखो देवदार को ...
भा रहा है ...
उसके लिए ...जो जा रहा है |
नीर का वो सादापन ...
निर्मल, निश्छल, भोलापन ...
स्वाति नक्षत्र की उस बूँद को ...
खुद में समा कर ...
एक सीप ढूंढ ..मना कर ...
मोती उसको बना कर ...
आज ला रहा है ..
उसके लिए ...जो जा रहा है |
मनुहार करता अम्बर देखो ...
दूर क्षितिज से ..
पोटली में बांधे ...
कुछ ला रहा है ..
उसके लिए ...जो जा रहा है |
पवन का वो गीत सुनो ...
पेडों का संगीत बुनो ...
जो पत्रकों की ..
सरसराहट में ..
नव राग छेड़े गा रहा है ..
उसके लिए.... जो जा रहा है |
श्वेत स्वर्ण की जगमगाहट ...
हिमगिरी की वो सुगबुगाहट ...
अपने ही अंदाज में ..
कम्पन ला रही है ...
जिसकी लय से उपजा सौंदर्य ...
देखो देवदार को ...
भा रहा है ...
उसके लिए ...जो जा रहा है |
नीर का वो सादापन ...
निर्मल, निश्छल, भोलापन ...
स्वाति नक्षत्र की उस बूँद को ...
खुद में समा कर ...
एक सीप ढूंढ ..मना कर ...
मोती उसको बना कर ...
आज ला रहा है ..
उसके लिए ...जो जा रहा है |
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