मेरे पास ख्वाबों की गठरी पड़ी है ..
मैं चुन चुन के सपने तुम्हें बांटता हूँ ..
गर्दिश में तारे भले आज हैं पर ..
मैं मेहनत की चक्की को फिर छांटता हूँ |
ये दुनिया फरेबी ! फरेबी सही ..
मैं सच की ही बाँहों में फिर जागता हूँ |
ठोकर भी लगती हैं, गिरता हूँ मैं ..
गिर के मैं उठता और फिर भागता हूँ |
आवाजें मेरी घुट गयी हैं कहीं ..
मैं नजरें उठा के फिर बोलता हूँ |
उलझते रहे हैं वो धागे मगर ..
मैं धागा नया एक फिर खोलता हूँ |
मैं खुद में सिमट के रोता भी हूँ ..
एक दिन हसूंगा पर ये जानता हूँ |
बाजी पे बाजी मैं हारा मगर ..
वही खेल खेलूं मैं ये ठानता हूँ |
फूलों में कांटे हैं बिखरे हुए ..
मैं छलनी पकड़ के उन्हें छानता हूँ |
मैं राहों पे चलता भटकता भी हूँ ..
मंजिल मिलेगी पर ये मानता हूँ |
Friday, March 30, 2012
Monday, February 20, 2012
वेदना
मेरे यारो मैं हार गया ..
UPSC की आंधी में ..
फिर से खाली वो वार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
मैं बड़ा नशीला होता था ..
सब जगते थे मैं सोता था ..
जीत मेरे बस में थी फिर भी ..
शायद ही कभी मैं रोता था |
कीड़ा UPSC का ..
बेमौत मुझे भी मार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
मैं सपने बड़े सजाता था ..
मैं वादे बड़े निभाता था ..
जीवटता का गुमान मुझे था ..
किस्मत से भिड जाता था |
महबूब वफ़ा का हारा था ...
गलबहियां ऐसी डार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
मैं आया था कुछ बनने को ..
कहीं सनने को कुछ करने को ..
क्या पता था मुझको की ये .
भरा घड़ा है भरने को |
मौसम की रवानी यूँ ही चली ..
सालों की कहानी यूँ ही चली ..
एक दो तीन फिर चार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
अब हँसते चेहरे आते हैं ..
सब खुश हो हो चिल्लाते हैं ..
मेरी तरह अभागे कुछ ..
अब सामान पकड़ घर जाते हैं |
अब घर कहाँ है लक्ष्य कहाँ पर ?
तुम पर जीवन ही वार दिया
मेरे यारो मैं हार गया |
जिस धरती पर तुम जीते हो ..
उस पर बहुतों की अरथी है ..
खिलाडी बदल गए हैं माना ..
पर वही खेल वो धरती है |
सब सफल रहो ये दुआ है उसकी ..
अंगारों पर चल जो पार गया ..
मेरे यारो मैं फिर हार गया ...
मैं सपनो से फिर पार गया ..
मेरे यारो मैं हार गया |
UPSC की आंधी में ..
फिर से खाली वो वार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
मैं बड़ा नशीला होता था ..
सब जगते थे मैं सोता था ..
जीत मेरे बस में थी फिर भी ..
शायद ही कभी मैं रोता था |
कीड़ा UPSC का ..
बेमौत मुझे भी मार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
मैं सपने बड़े सजाता था ..
मैं वादे बड़े निभाता था ..
जीवटता का गुमान मुझे था ..
किस्मत से भिड जाता था |
महबूब वफ़ा का हारा था ...
गलबहियां ऐसी डार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
मैं आया था कुछ बनने को ..
कहीं सनने को कुछ करने को ..
क्या पता था मुझको की ये .
भरा घड़ा है भरने को |
मौसम की रवानी यूँ ही चली ..
सालों की कहानी यूँ ही चली ..
एक दो तीन फिर चार गया
मेरे यारो मैं हार गया |
अब हँसते चेहरे आते हैं ..
सब खुश हो हो चिल्लाते हैं ..
मेरी तरह अभागे कुछ ..
अब सामान पकड़ घर जाते हैं |
अब घर कहाँ है लक्ष्य कहाँ पर ?
तुम पर जीवन ही वार दिया
मेरे यारो मैं हार गया |
जिस धरती पर तुम जीते हो ..
उस पर बहुतों की अरथी है ..
खिलाडी बदल गए हैं माना ..
पर वही खेल वो धरती है |
सब सफल रहो ये दुआ है उसकी ..
अंगारों पर चल जो पार गया ..
मेरे यारो मैं फिर हार गया ...
मैं सपनो से फिर पार गया ..
मेरे यारो मैं हार गया |
Friday, December 30, 2011
गिलास
वो मोहब्बतें बाजारों में लुटाते हैं बेफिक्र ..
और हम वही खाली गिलास लिए बैठे हैं |
काश कि कभी आँखों की शराब हमें भी मयस्सर हो ..
जिंदगी गुजर रही है ये ..आस लिए बैठे हैं |
मौत से पहले बेमौत मर चुके हैं कब के ..
अब तो बस ये झूठी सांस लिए बैठे हैं |
मक्का काबा सब बेमानी लग रहे हैं ..
तेरी झलक की एक अरदास लिए बैठे हैं |
मेरी दीवानगी पर लोग आज हंसने लगे हैं ..
कौन उन्हें बताये कि हम कुछ खास लिए बैठे हैं |
उनकी बेवफाई के चर्चे बड़े हो रहे महकमो में ..
उन पर फ़िदा कुछ अपनी लाश लिए बैठे हैं |
जिंदगी के जुए में हारना अब तय है ...
क्या करें वो किस्मत के कुछ ताश लिए बैठे हैं |
शराब भी आर पार हो रही है पता नहीं कहाँ ..
लगता है हम फिर वही खाली गिलास लिए बैठे हैं |
और हम वही खाली गिलास लिए बैठे हैं |
काश कि कभी आँखों की शराब हमें भी मयस्सर हो ..
जिंदगी गुजर रही है ये ..आस लिए बैठे हैं |
मौत से पहले बेमौत मर चुके हैं कब के ..
अब तो बस ये झूठी सांस लिए बैठे हैं |
मक्का काबा सब बेमानी लग रहे हैं ..
तेरी झलक की एक अरदास लिए बैठे हैं |
मेरी दीवानगी पर लोग आज हंसने लगे हैं ..
कौन उन्हें बताये कि हम कुछ खास लिए बैठे हैं |
उनकी बेवफाई के चर्चे बड़े हो रहे महकमो में ..
उन पर फ़िदा कुछ अपनी लाश लिए बैठे हैं |
जिंदगी के जुए में हारना अब तय है ...
क्या करें वो किस्मत के कुछ ताश लिए बैठे हैं |
शराब भी आर पार हो रही है पता नहीं कहाँ ..
लगता है हम फिर वही खाली गिलास लिए बैठे हैं |
Tuesday, December 13, 2011
जीवन
मैं गिरता हूँ मैं उठता हूँ ..
मैं हँसता हूँ मैं रोता हूँ ..
मैं पाता हूँ मैं खोता हूँ ..
मैं दूरी हूँ ..मजबूरी हूँ ..
मैं सुर्ख लाल पीलापन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
मैं कभी इतराता बादल हूँ ..
कभी मैं माँ का आँचल हूँ ..
मैं सिमटा सा आंसुओं में ..
तेरी आँखों का काजल हूँ
मैं चिलमिल सी उस गर्मी में ..
खुद को बरसाता सावन हूँ
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
मैं ख्वाब बनाता बाग़ सजाता ..
सपनो के वो पर फैलाता ..
टूटन को महसूस कर कभी ..
दुःख के गीत सुरों में गाता ..
मैं रंग रंग के रूप दिखा कर ..
सुलझने वाली उलझन हूँ ..
मैं जीवन हूँ मैं जीवन हूँ |
मैं जख्म सुनहरे देता हूँ ..
मैं दर्द भी गहरे देता हूँ
उत्तर की उम्मीद नहीं हो ..
प्रश्न वहाँ कर लेता हूँ |
तू आगे बढ़.. यूँ न डर ..
मैं मुक्त मुक्त सा बंधन हूँ ..
मैं जीवन हूँ मैं जीवन हूँ |
मैंने तुझको है जन्म दिया ..
मैंने तुझसे है प्रेम किया ..
सब कुछ तो एक धोखा है ..
क्या मैंने दिया ? क्या तूने लिया ?
जो आग उगलती विष फुंकारों में ..
शीतलता न तजे वो चन्दन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
तू चलता जा तुझे चलना है ..
इन अंगारों में जलना है ..
इसमें छुपा है ख्वाब तेरा ..
जो फिर इस दिल में पलना है ..
मेरा हाथ पकड़ और चलते चल ..
मैं ही तेरा तन मन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
मैं हँसता हूँ मैं रोता हूँ ..
मैं पाता हूँ मैं खोता हूँ ..
मैं दूरी हूँ ..मजबूरी हूँ ..
मैं सुर्ख लाल पीलापन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
मैं कभी इतराता बादल हूँ ..
कभी मैं माँ का आँचल हूँ ..
मैं सिमटा सा आंसुओं में ..
तेरी आँखों का काजल हूँ
मैं चिलमिल सी उस गर्मी में ..
खुद को बरसाता सावन हूँ
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
मैं ख्वाब बनाता बाग़ सजाता ..
सपनो के वो पर फैलाता ..
टूटन को महसूस कर कभी ..
दुःख के गीत सुरों में गाता ..
मैं रंग रंग के रूप दिखा कर ..
सुलझने वाली उलझन हूँ ..
मैं जीवन हूँ मैं जीवन हूँ |
मैं जख्म सुनहरे देता हूँ ..
मैं दर्द भी गहरे देता हूँ
उत्तर की उम्मीद नहीं हो ..
प्रश्न वहाँ कर लेता हूँ |
तू आगे बढ़.. यूँ न डर ..
मैं मुक्त मुक्त सा बंधन हूँ ..
मैं जीवन हूँ मैं जीवन हूँ |
मैंने तुझको है जन्म दिया ..
मैंने तुझसे है प्रेम किया ..
सब कुछ तो एक धोखा है ..
क्या मैंने दिया ? क्या तूने लिया ?
जो आग उगलती विष फुंकारों में ..
शीतलता न तजे वो चन्दन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
तू चलता जा तुझे चलना है ..
इन अंगारों में जलना है ..
इसमें छुपा है ख्वाब तेरा ..
जो फिर इस दिल में पलना है ..
मेरा हाथ पकड़ और चलते चल ..
मैं ही तेरा तन मन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |
Sunday, December 11, 2011
इजहार
वो कल रात मेरे चौखट पर आई ..
सकुचाई ..शरमाई ..
हौले से मुस्काई |
चांदनी रात में ..
बात ही बात में ..
मैं इजहार करने वाला था ..
दिल के बाहर ..
प्यार करने वाला था |
लेकिन शब्द अटक गए ..
संदेह खटक गए ..
इकरार और इनकार की कशमकश में ..
कुछ शीशे चटक गए |
वैसे चांदनी रात जवान थी ..
उस शरबत के आगोश में ..
जिसे वो लेकर आई थी ..
मन में लड्डू फूट रहे थे ..
दिल में दिवाली छाई थी ..
लेकिन बाहर मैं अनजान था ..
डरा सा बियाबान था ..
चीखने की हसरत लिए ..
खुद में परेशान था |
इजहार का मौका सही था ..
पर कमबख्त दिल और कहीं था ..
प्रश्न से ज्यादा उत्तर की सोच में ..
शब्दों से ज्यादा भावों के लोच में ..
मैं घिरा हुआ था ..
और फिर स्वेद बिंदु छलक उठे ..
पता नहीं क्यूँ ..शरबत देते हुए ..
उसने मुझे छुआ था |
अब तो प्रलय आ गया था ..
कोहराम छा गया था ..
जैसे बिना आवाज के कोई ..
अच्छा सा गीत गा गया था ..
इस उधेड़बुन में ..
वो जाने लगी थी ..
अपनी आँखें झुका कर ..
लटों पर हाथ फिर कर ..
शरमाकर ..सकुचाकर ..
और मैं इजहार की उम्मीद को ..
उस हसीं गीत को ..
दिल में दफन करने वाला था ..
रंगों की चादर को ..
फिर कफ़न करने वाला था |
कि अचानक वो पीछे मुड़ी ..
पास आई ..
साँसों से सांसें जुडी ..
और वो हौले से बोली ..
आप बेकार ही इतना तकल्लुफ करते हैं ..
घबराइए मत ! हम भी आप पर मरते हैं |
सकुचाई ..शरमाई ..
हौले से मुस्काई |
चांदनी रात में ..
बात ही बात में ..
मैं इजहार करने वाला था ..
दिल के बाहर ..
प्यार करने वाला था |
लेकिन शब्द अटक गए ..
संदेह खटक गए ..
इकरार और इनकार की कशमकश में ..
कुछ शीशे चटक गए |
वैसे चांदनी रात जवान थी ..
उस शरबत के आगोश में ..
जिसे वो लेकर आई थी ..
मन में लड्डू फूट रहे थे ..
दिल में दिवाली छाई थी ..
लेकिन बाहर मैं अनजान था ..
डरा सा बियाबान था ..
चीखने की हसरत लिए ..
खुद में परेशान था |
इजहार का मौका सही था ..
पर कमबख्त दिल और कहीं था ..
प्रश्न से ज्यादा उत्तर की सोच में ..
शब्दों से ज्यादा भावों के लोच में ..
मैं घिरा हुआ था ..
और फिर स्वेद बिंदु छलक उठे ..
पता नहीं क्यूँ ..शरबत देते हुए ..
उसने मुझे छुआ था |
अब तो प्रलय आ गया था ..
कोहराम छा गया था ..
जैसे बिना आवाज के कोई ..
अच्छा सा गीत गा गया था ..
इस उधेड़बुन में ..
वो जाने लगी थी ..
अपनी आँखें झुका कर ..
लटों पर हाथ फिर कर ..
शरमाकर ..सकुचाकर ..
और मैं इजहार की उम्मीद को ..
उस हसीं गीत को ..
दिल में दफन करने वाला था ..
रंगों की चादर को ..
फिर कफ़न करने वाला था |
कि अचानक वो पीछे मुड़ी ..
पास आई ..
साँसों से सांसें जुडी ..
और वो हौले से बोली ..
आप बेकार ही इतना तकल्लुफ करते हैं ..
घबराइए मत ! हम भी आप पर मरते हैं |
चोरी
चुराना था तो तुम्हारा दिल चुराते ..
कम से कम तुम उस अदा से तो मुस्कुराते ..
चुराना था तो तुम्हारी अंगडाई चुराते ..
डरते थे लेकिन उस नूर को कहाँ छुपाते ?
चुराना था तो तुम्हारी आँखों का नशा चुराते ..
पर उस मदहोशी में बताओ कैसे वफ़ा निभाते ?
चुराना था तो तुम्हारी लट का वो बाल चुराते ..
पर फिर कैसे उसे घुमाने की हया समझ पाते ?
चुराना था वो मखमली गाल चुराते ..
पर फिर कैसे उसे छूने की ख्वाहिश जताते ?
चुराना था वो वो अरुण अधर चुराते ..
पर ये बताओ फिर कैसे तुम्हें ऐसे हंसाते ?
चुराना था तो तुम्हारी हरिणी चाल चुराते ..
पर तुम्हें रोक फिर कैसे तुम्हें सताते ?
चुराना था तो तुम्हारी आवाज चुराते ..
पर डरते थे कि खुद को कैसे सुनाते ?
और हमने तो चुराने की ख्वाहिश की थी ..
तुमने तो हमको पहले ही चुरा लिया है ..
सदियाँ हो गयी रास्ता न मिला ..
दिल में ऐसे कहीं छुपा लिया है |
कम से कम तुम उस अदा से तो मुस्कुराते ..
चुराना था तो तुम्हारी अंगडाई चुराते ..
डरते थे लेकिन उस नूर को कहाँ छुपाते ?
चुराना था तो तुम्हारी आँखों का नशा चुराते ..
पर उस मदहोशी में बताओ कैसे वफ़ा निभाते ?
चुराना था तो तुम्हारी लट का वो बाल चुराते ..
पर फिर कैसे उसे घुमाने की हया समझ पाते ?
चुराना था वो मखमली गाल चुराते ..
पर फिर कैसे उसे छूने की ख्वाहिश जताते ?
चुराना था वो वो अरुण अधर चुराते ..
पर ये बताओ फिर कैसे तुम्हें ऐसे हंसाते ?
चुराना था तो तुम्हारी हरिणी चाल चुराते ..
पर तुम्हें रोक फिर कैसे तुम्हें सताते ?
चुराना था तो तुम्हारी आवाज चुराते ..
पर डरते थे कि खुद को कैसे सुनाते ?
और हमने तो चुराने की ख्वाहिश की थी ..
तुमने तो हमको पहले ही चुरा लिया है ..
सदियाँ हो गयी रास्ता न मिला ..
दिल में ऐसे कहीं छुपा लिया है |
Wednesday, December 7, 2011
पता
मेरा हाल न पूछो यारो ..
जीता हूँ कुछ निशानों में |
मैं नहीं मिलूँगा तुम्हें कहीं ..
रहता हूँ कुछ ठिकानो में |
मेरी तबरीज अब खो गयी कहीं ..
बिकता हूँ मैं दुकानों में |
उस ओर जाओगे तो पूछ लेना ..
मेरी रूह का पता उन मकानों में |
जीता हूँ कुछ निशानों में |
मैं नहीं मिलूँगा तुम्हें कहीं ..
रहता हूँ कुछ ठिकानो में |
मेरी तबरीज अब खो गयी कहीं ..
बिकता हूँ मैं दुकानों में |
उस ओर जाओगे तो पूछ लेना ..
मेरी रूह का पता उन मकानों में |
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