Saturday, April 23, 2011

मेरी रेल

पटरी पर दौड़ती मेरी रेल
जाने कहाँ जा रही है !

एक अनजाने गुलिस्तां में..
भागते से ..दौड़ते से ..तरु ..
और उनके साथ कदमताल करती ..
मेरी रेल ..
जिंदगी के गीत गा रही है ..
जाने कहाँ जा रही है !

कुछ पटरियां अनजान सी ..
मेरी रेल को लालची नजरों से ..
ताकती ..झांकती ..प्रेम से ..
सोचती, नदी के किनारे तो नहीं !
मिलने की आस में गँवा देते अस्तित्व ..
समुन्दर की गोद में |
मेरी रेल जवाब में ..
कुछ कह रही है |
सीटी बजा रही है ...
जाने कहाँ जा रही है !

स्टेशन भी बेगाने से ..
अनजान बन इस्तकबाल करते ..
पर फिर लाल हरी सी कुछ मिठाइयाँ देकर ..
करते नियंत्रित ..पानी की फुहारें भी..
मनुहार करती ..सोचती !
सोचती की मेरी रेल बैठेगी कुछ देर और ..
लेकिन चलना भाग्य में लिखा कर ..
मेरी रेल कहीं से ला रही है |
जाने कहाँ जा रही है !

मेरी रेल के अन्दर देखो ..
देखो ! एक दुनिया बसी है ..
एक बच्चा रो रहा है ..
एक काकी हंस रही है ..
एक गाने वाला पत्थर बजा ..
मांगता है जिंदगी के कुछ और दिन |
और एक पंडित ..पंचांगों की उधेड़बुन में ..
बतला देता की कब लगन ठहरा है ..
और खुश हो जाता एक कुनबा ..
मेरी रेल देखकर इसको न जाने क्यूँ ..
शर्मा रही है ..
जाने कहाँ जा रही है !

मेरी रेल गुजरती है ..
धान के खेतों से ..
बालियाँ कहीं सोना बन चुकी हैं ..
और आते कहीं बीहड़ ..
कहीं रेगिस्तान भी ..
नदियाँ और टूटे मकान भी |
कलोल भी निर्जन भी जिनके बीच ..
उन्मुक्त मेरी रेल ..मुक्त है ..
समभाव है |
निर्वाण की परिभाषा ..छुक छुक करते ..
देखो कैसे समझा रही है |
जाने कहाँ जा रही है !

मेरी रेल देखो भेद नहीं करती ..
राजा या रंक ! अक्षर या अंक !
पहुंचाती सबको है ..गंतव्य पर ..
चढ़ाती सबको है ..मंतव्य पर ..
हाँ देखो सबको चढ़ाती है ..
इंसानों की बस्ती में ..
केवल इंसान को बढाती है |
फिर भी हो जाते हैं कुछ गोधरा लेकिन !
और 'क्यूँ' की खोज में ..
मेरी रेल देखो ..
सो नहीं पा रही है ..
जाने कहाँ जा रही है !

मेरी रेल रात में ..
ठहरी ठहरी बात में ..
अंधेरों को चीरकर ..
निर्जनता को जीतकर ..
बढती रही है आज तक ..
और दम नहीं लेती ..
जब तक की लक्ष्य न मिले ..
और फिर भी रुकने का नाम नहीं !
क्यूंकि नए देश में जाना है ..
नया लक्ष्य बनाना है |
है न हम इंसानों की जिंदगी की तरह ?
शायद यही हमको बता रही है ..
मेरी रेल ...
अपने नए देश की ओर जा रही है |