Friday, December 30, 2011

गिलास

वो मोहब्बतें बाजारों में लुटाते हैं बेफिक्र ..
और हम वही खाली गिलास लिए बैठे हैं |

काश कि कभी आँखों की शराब हमें भी मयस्सर हो ..
जिंदगी गुजर रही है ये ..आस लिए बैठे हैं |

मौत से पहले बेमौत मर चुके हैं कब के ..
अब तो बस ये झूठी सांस लिए बैठे हैं |

मक्का काबा सब बेमानी लग रहे हैं ..
तेरी झलक की एक अरदास लिए बैठे हैं |

मेरी दीवानगी पर लोग आज हंसने लगे हैं ..
कौन उन्हें बताये कि हम कुछ खास लिए बैठे हैं |

उनकी बेवफाई के चर्चे बड़े हो रहे महकमो में ..
उन पर फ़िदा कुछ अपनी लाश लिए बैठे हैं |

जिंदगी के जुए में हारना अब तय है ...
क्या करें वो किस्मत के कुछ ताश लिए बैठे हैं |

शराब भी आर पार हो रही है पता नहीं कहाँ ..
लगता है हम फिर वही खाली गिलास लिए बैठे हैं |

Tuesday, December 13, 2011

जीवन

मैं गिरता हूँ मैं उठता हूँ ..
मैं हँसता हूँ मैं रोता हूँ ..
मैं पाता हूँ मैं खोता हूँ ..
मैं दूरी हूँ ..मजबूरी हूँ ..
मैं सुर्ख लाल पीलापन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |

मैं कभी इतराता बादल हूँ ..
कभी मैं माँ का आँचल हूँ ..
मैं सिमटा सा आंसुओं में ..
तेरी आँखों का काजल हूँ
मैं चिलमिल सी उस गर्मी में ..
खुद को बरसाता सावन हूँ
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |

मैं ख्वाब बनाता बाग़ सजाता ..
सपनो के वो पर फैलाता ..
टूटन को महसूस कर कभी ..
दुःख के गीत सुरों में गाता ..
मैं रंग रंग के रूप दिखा कर ..
सुलझने वाली उलझन हूँ ..
मैं जीवन हूँ मैं जीवन हूँ |

मैं जख्म सुनहरे देता हूँ ..
मैं दर्द भी गहरे देता हूँ
उत्तर की उम्मीद नहीं हो ..
प्रश्न वहाँ कर लेता हूँ |
तू आगे बढ़.. यूँ न डर ..
मैं मुक्त मुक्त सा बंधन हूँ ..
मैं जीवन हूँ मैं जीवन हूँ |

मैंने तुझको है जन्म दिया ..
मैंने तुझसे है प्रेम किया ..
सब कुछ तो एक धोखा है ..
क्या मैंने दिया ? क्या तूने लिया ?
जो आग उगलती विष फुंकारों में ..
शीतलता न तजे वो चन्दन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |

तू चलता जा तुझे चलना है ..
इन अंगारों में जलना है ..
इसमें छुपा है ख्वाब तेरा ..
जो फिर इस दिल में पलना है ..
मेरा हाथ पकड़ और चलते चल ..
मैं ही तेरा तन मन हूँ ..
मैं जीवन हूँ ..मैं जीवन हूँ |

Sunday, December 11, 2011

इजहार

वो कल रात मेरे चौखट पर आई ..
सकुचाई ..शरमाई ..
हौले से मुस्काई |
चांदनी रात में ..
बात ही बात में ..
मैं इजहार करने वाला था ..
दिल के बाहर ..
प्यार करने वाला था |
लेकिन शब्द अटक गए ..
संदेह खटक गए ..
इकरार और इनकार की कशमकश में ..
कुछ शीशे चटक गए |
वैसे चांदनी रात जवान थी ..
उस शरबत के आगोश में ..
जिसे वो लेकर आई थी ..
मन में लड्डू फूट रहे थे ..
दिल में दिवाली छाई थी ..
लेकिन बाहर मैं अनजान था ..
डरा सा बियाबान था ..
चीखने की हसरत लिए ..
खुद में परेशान था |
इजहार का मौका सही था ..
पर कमबख्त दिल और कहीं था ..
प्रश्न से ज्यादा उत्तर की सोच में ..
शब्दों से ज्यादा भावों के लोच में ..
मैं घिरा हुआ था ..
और फिर स्वेद बिंदु छलक उठे ..
पता नहीं क्यूँ ..शरबत देते हुए ..
उसने मुझे छुआ था |
अब तो प्रलय आ गया था ..
कोहराम छा गया था ..
जैसे बिना आवाज के कोई ..
अच्छा सा गीत गा गया था ..
इस उधेड़बुन में ..
वो जाने लगी थी ..
अपनी आँखें झुका कर ..
लटों पर हाथ फिर कर ..
शरमाकर ..सकुचाकर ..
और मैं इजहार की उम्मीद को ..
उस हसीं गीत को ..
दिल में दफन करने वाला था ..
रंगों की चादर को ..
फिर कफ़न करने वाला था |
कि अचानक वो पीछे मुड़ी ..
पास आई ..
साँसों से सांसें जुडी ..
और वो हौले से बोली ..
आप बेकार ही इतना तकल्लुफ करते हैं ..
घबराइए मत ! हम भी आप पर मरते हैं |

चोरी

चुराना था तो तुम्हारा दिल चुराते ..
कम से कम तुम उस अदा से तो मुस्कुराते ..

चुराना था तो तुम्हारी अंगडाई चुराते ..
डरते थे लेकिन उस नूर को कहाँ छुपाते ?

चुराना था तो तुम्हारी आँखों का नशा चुराते ..
पर उस मदहोशी में बताओ कैसे वफ़ा निभाते ?

चुराना था तो तुम्हारी लट का वो बाल चुराते ..
पर फिर कैसे उसे घुमाने की हया समझ पाते ?

चुराना था वो मखमली गाल चुराते ..
पर फिर कैसे उसे छूने की ख्वाहिश जताते ?

चुराना था वो वो अरुण अधर चुराते ..
पर ये बताओ फिर कैसे तुम्हें ऐसे हंसाते ?

चुराना था तो तुम्हारी हरिणी चाल चुराते ..
पर तुम्हें रोक फिर कैसे तुम्हें सताते ?

चुराना था तो तुम्हारी आवाज चुराते ..
पर डरते थे कि खुद को कैसे सुनाते ?

और हमने तो चुराने की ख्वाहिश की थी ..
तुमने तो हमको पहले ही चुरा लिया है ..
सदियाँ हो गयी रास्ता न मिला ..
दिल में ऐसे कहीं छुपा लिया है |

Wednesday, December 7, 2011

पता

मेरा हाल न पूछो यारो ..
जीता हूँ कुछ निशानों में |

मैं नहीं मिलूँगा तुम्हें कहीं ..
रहता हूँ कुछ ठिकानो में |

मेरी तबरीज अब खो गयी कहीं ..
बिकता हूँ मैं दुकानों में |

उस ओर जाओगे तो पूछ लेना ..
मेरी रूह का पता उन मकानों में |

इन्तजार

तू पास थी ..
अरदास थी ...
आभास थी ..
विश्वास थी |
तू क्यूँ सो गयी ..
तू क्यूँ खो गयी ..
उस दुनिया में ..
जहां ..
प्यार था तन्हा सा ..
रूप था नन्हा सा ..
जो बरबस मुस्कुराता था ..
रो कर भी हंसाता था |
वो सुनहरी शाम दे ..
या वो हसीं अंजाम दे ..
जिसकी गोद में कहीं ..
आ बिछुं या नहीं ?
तेरे जवाब की उम्मीद में ..
बैठा सोया नींद में ..
चीलू अनजान चल रहा है ..
मौत बेमौत जल रहा है |

मैं

मेरे ख्वाबों की तस्वीर मुझसे है
मेरे वादों की जंजीर मुझसे है |

तकल्लुफ कितना करे कोई वफ़ा में ..
रांझा हूँ मैं ....हीर... मुझसे है |

मंदिर मस्जिद अब नहीं लुभाते मुझे ..
मैं ब्रहम हूँ ..पीर मुझसे है |

ख्वाब अधूरे हैं पर बदनामी नहीं ..
नग्न द्रौपदी हूँ मैं ..चीर मुझसे है |

मैं प्यासा हूँ ! ये भ्रम है तेरा ...
मैं धरती हूँ ..नीर मुझसे है |

तेरा साथ न तेरे ख्वाबों का साथ चाहिए ..
मैं अनेक हूँ ..भीड़ मुझसे है |

Saturday, December 3, 2011

कशमकश

मेरी जिंदगी अनसुलझे एहसासों का समुन्दर है ..
डूब रहा हूँ नहीं पता कितनी गहराई अन्दर है ?

मुखौटों की बेचैनी मुझे जीने नहीं देती ..
अपने चेहरे की तलाश पीने नहीं देती |

कशमकश का माहौल मेरे अन्दर छाया है ..
मेरे साथ चलता ये किसका साया है ?

मेरे ख्वाब अब श्वेत स्याह हो चुके हैं ..
जो बचे हैं मेरे साथ ही सो चुके हैं |

मुझमें कभी मैं तो कभी कोई और जीता है ..
कौन सा कर्म करूँ ?
बता दे यदि तू गीता है |