Monday, June 25, 2018

अभी अभी

जगमग जगमग ख्वाबों सी तुम
रिमझिम रिमझिम बारिश सी तुम
लेकर पुलिंदा खुशियों का
कहाँ बांटने चले चली हो ?
अभी अभी तो मुझे मिली हो !

नन्हे नन्हे बादल सी तुम
भीगे भीगे आंचल सी तुम
घबराते उस ओस बिंदु के
पीछे जैसे पागल सी तुम
सर्द धूप सी कहाँ खिली हो ?
अभी अभी तो मुझे मिली हो !

आँखों में तारों को लेकर
बातों के प्यालों को लेकर
रंगो की बारातें लेकर
जीवन की सौगातें लेकर
तुम झूम झूम के
घूम घूम के
पूरी दुनिया मुट्ठी में करने
हर आकार में रंग सा भरने
सपनों को जीवंत सा करने
कोलाहल को अरिहंत सा करने
मुझे बताओ कहाँ चली हो ?
अभी अभी तो मुझे मिली हो !

कितना सारा प्रेम लुटाकर
कितना सारा दर्प मिटाकर
बिल्कुल उस घाटी के जैसी
बिल्कुल उस माटी के जैसी
जिसमें खोकर छोटे छोटे
बीज अमर हो जाते हैं
जिसमें पाकर फूलों को
शांत भ्रमर हो जाते हैं
तुम्हें ढूंढता जीवन मेरा
कौन शहर हो कौन गली हो ?
अभी अभी तो मुझे मिली हो !

कैसे तुम बातों बातों में
मन को ऐसे पढ़ लेती हो ?
कैसे तुम सपनों के पर्वत
पर मन चाहे चढ़ लेती हो ?
कैसे तुम चाहत की दुनिया
को आंखों में रख लेती हो?
कैसे तुम भावों के इतने
रंगों को यूँ चख लेती हो ?
ऐसा लगता है तुम सतरंगी
झूले में ही कहीं पली हो
अभी अभी तो मुझे मिली हो !

छुई मुई सी कोमल कोमल
खिली खिली सी कोपल कोपल
सुबह की पहली अंगड़ाई सी
शाम की मोहक परछाई सी
क्षितिज पे उतरी तन्हाई सी
कैसे तुम इन चट्टानों से
बेखबर सी भिड़ जाती हो
कैसे तुम हर कश्ती में
हंसती हंसती मिल जाती हो?
तुम्हें ढूंढता जीवन मेरा
तुम्हें समझता यौवन मेरा
सरिता सी तुम बहती जाती
कैसा हो जीवन? कहती जाती
फाड़ के इन सब चट्टानों को
मुझे बताओ कहाँ खुली हो ?
अभी अभी तो मुझे मिली हो !

Tuesday, March 20, 2018

किरदार

















मुझे जानने की ख्वाहिश बहुतों ने की
उनको पता नहीं था ..
मैं किरदार में हूँ !

मेरा किरदार अनोखा है
खुद से जुदा
खुद पर फ़िदा
देखता सबको
देखता ख़ुद को !
और हंस देता बेमतलब सा 
बेमतलब की बातों पर |
हंसाता रुलाता छिपाता सजाता
मेरा किरदार वादे निभाता
कुछ को समझ आता
कुछ को खटक जाता !
सुनकर ख़ामोश सोचता
मैं किरदार में हूँ !

कुछ चेहरे हैं , कुछ हैं मुखौटे
सिक्के चमक रहे हैं खोटे खोटे
वो भी तो किरदार हैं
वो भी असरदार हैं
फिर लड़ाई किरदारों की है ?
या मेरी तुम्हारी !
किरदार जान नहीं पायेंगे
पहचान नहीं पायेंगे
कोशिश तो करेंगे
शायद पहचान भी लें
पर मान नहीं पायेंगे !
मैं भी क्यूँ मानूँ ?
मैं तो किरदार में हूँ !

मेरा प्रेम भी किरदारों वाला है
तुमने भी तो शौक़ पाला है ?
सपने जिंदगी को मात दे रहे हैं
किरदार आग को आँच दे रहे हैं
डर क्यूँ रहे हो ?
तुम्हारी भी तो केंचुली है !
किरदारों की शोख़ी
विरासत में मिली है |
ये देख रहे हो न समाज !
इसका भी किरदार है
कभी मंदिर है कभी मस्जिद है
और कभी लुटता बाजार है !
तो आओ कुछ खरीदें यहाँ से
प्रेम , द्वेष , दया , हिंसा
सब मिलता है यहाँ |
कीमत बदल जाती है पर
किरदार देखकर !
तो बदल लेना तुम भी किरदार
दुकान देखकर !
मैंने तो मुफ्त में लिया है सब कुछ
मैं तो किरदार में हूँ |

कभी कभी जब खामोश सोता हूँ
तो अपने किरदार में नहीं होता हूँ
देख नहीं पाता खुद को तब !
तुम भी नहीं देख पाओगे
कितने शीशे लाओगे ?
आदमी नंगा होता है
अपने किरदार के बिना !
पता है तुम्हें
संभल नहीं पाओगे |
तो अपने किरदार में रहो
आँखे बंद करो
और कहीं दूर तक बहो
जहाँ एक गाँव नया है
और वहाँ भी हवा चल रही है 
नये नये किरदारों की !
मुझे ढूँढ रहे हो ?
नहीं मिलूंगा !
मैं किरदार में हूँ  |



Monday, January 16, 2017

सभ्यता और समय 















समय की चाल पर खेलता
खंडहरों का हुजूम
और खंडहर हो जाता है
देखता अगर खुद को आईने में
बेसबर हो जाता है !

अंतहीन जीवन की कल्पना
स्वयंभू का अस्तित्व खोजता
मानव गढ़ता है राजमहल
होती है चहल पहल
चंद पलों की ...
और पल अगला निगल जाता है
पुराने पल को !
ठिठकती सभ्यतायें देखती
इस सतत छल को !

अदना सा मानव देखता
खुद को विजयी होते
सागर , पर्वत , व्योम
कितने छोटे लगते !
लेकिन भान नहीं है
धरती के गर्भ का ?
या फिर भान अधिक है
स्वयं के दर्प का ?
लावा निकलता कभी गर्भ से
कभी अपने अंदर छुपे दर्प से
और लुहलुहान होकर आखिर
बदल जाती है सभ्यता !
जिसे देखने आती नयी सभ्यता
अपना नया दर्प लेके !

ये पहिया चलता जाता है
घूम कर फिर वहीँ वहीँ आता है
बीच में कुछ अस्तित्वहीन धूलि कण
कर देते हैं अपने काल्पनिक युग का निर्माण
जिसे अगले चक्र में पहिये के नीचे आना है
जिसे अपना वजूद खुद ही मिटाना है !!


Sunday, May 15, 2016

शिक्षक शिक्षकों से ....


मैं शिक्षक हूँ मैं शिक्षा की कुछ बात बताने आया हूँ
मैं अध्यापक का नया नवेला अर्थ सुनाने आया हूँ ।

मेरी छोटी सी विनती है कि शिक्षा को समझे बुझेँ
मेरा अपना जो अनुभव है , मैं उसे साथ में लाया हूँ ।

शिक्षा क्या है ?
चंद किताबें !
जिनमे बस कुछ अक्षर होते
और कुछ मनमानी सी बातें ?
यही अगर बस शिक्षा है तो
शिक्षक का कोई मोल नहीं
उसकी अपनी कोई सोच नहीं
उसके अपने कोई बोल नहीं !

शिक्षा का बस मर्म यही है
सही गलत का भेद सिखाओ
रोबोट किताबी नहीं चाहिये
एक अच्छा इंसान बनाओ ।

कौतुहल है बच्चों में तो
तुम सबसे अच्छे अध्यापक हो
प्रश्न वहाँ से जितने आयें
उतना तुम मुस्काते जाओ
क्यूंकि कौतूहल में ही तो
नये विश्व का राज छुपा है
बच्चों की विस्मित आँखों में
ऊँचा उड़ता सा बाज़ छुपा है ।

उस बाज़ को हमें उड़ाना है
उसके पंखो की ताकत से
आसमान ये संवरेगा
उसकी आँखों की ताकत से
आसमान ये देखेगा ..
एक नया जमाना
नया तराना
दुनिया का
जिसके निर्माता शिक्षक हैं ।

शिक्षक जब शिक्षक न होकर
दोस्त बने इन बच्चों के
तो समझूंगा कि तुमने
शिक्षा को पूरा समझा है
और पूरा ही समझाया है
इन प्यारे प्यारे बच्चों को ।

और केवल बस पढ़ाते रहना
नहीं है पूरा  काम हमारा
प्रश्न पूछना अपने से   ...
हम कितना सीखे हैं हर दिन
कितना और सीखना है ?
कितनी मेहनत करनी है ?
कितना और सींचना है ?
तब जाके इन प्यारे पौधों
को पानी दे पाओगे
इन्हे सींचकर अपने श्रम से
हरा भरा कर पाओगे
नहीं तो फिर ये सूखेंगे
और तुम भी मुरझाओगे ।

शिक्षक ऐसा दर्पण है
जिसमे अपने चेहरा देखें
बच्चे हरपल हँसते हँसते
जैसा दर्पण वैसा चेहरा
जैसी चालें वैसा मोहरा
मोहरों को हर मुश्किल में
लड़ते रहना सिखलाना है
खुद ही बन के नयी प्रेरणा
बच्चों को दिखलाना है
तभी तो कुछ दे पाओगे
अपने में से बच्चों को
तभी तो कुछ कह पाओगे
इन सब मन के सच्चों को ।

ये माटी जैसे कच्ची कच्ची
ज्यूँ ढालोगे ढल जाएंगे
तुम बस थोड़ा हाथ लगाओ
नये नये बन जाएंगे
और जो तुम इनसे भागोगे
तो शिक्षा का क्या अर्थ रहा ?
ये शिक्षा केवल शब्द नहीं है
एक पूरा आंदोलन है

तुम गांधी हो आंदोलन के
तुम्हे आज़ादी अब लानी है
एक ऐसी फ़ौज बनानी है
जो सत्य अहिंसा के रस्ते में
चलके अपनी मंजिल पाये
रामानुजम के साथ चले
और रमन से हाथ मिलाएं
ग़ालिब से अल्फाज़ लिखें
विश्वेसरैया का मान बढ़ायें

तभी गर्व से कह सकते हो
शिक्षक हूँ मैं शिक्षक हूँ
कर्मो का और मूल्यों का
मैं इकलौता रक्षक हूँ ।

तुम गर ये कर सको तो
मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगा
शिक्षक था मैं शिक्षक हूँ मैं
गर्व से अपने बाद कहूंगा ।

Sunday, May 8, 2016

माँ




एक चाबी जैसे गुड्डे की तरह
बेफिक्र हो लगातार हर पल
जो चलती चली जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जो घर में मिठाई आती है
तो उसका क पेट भरा होता है
क्यूंकि बच्चे का मन हरा होता है
और उसको खिलाते वो मिठाई
अपनी आँखों से खाती है
वो माँ कहलाती है ।

ओढ़कर जब तुम चादर कहीं
सपनो में जी रहे होते हो
जो बुनकर एक कंबल नया
तुमको चुपके से ओढ़ा जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जिस स्वेटर को समझकर पुरानी
फेंक देते हो नयी चीजों के लिए
उसके रेशों में भर प्यार का शहद
एक नयी चाशनी बनती है
वो माँ कहलाती है ।

थक कर कभी जब सोती है
तुम्हारे जगने की रात होती है
कैसे नींद आये उसे !
थपकियों से कहानियो से
कोशिश करती
अपनी नींद भूल कर !
तुमको फिर जो सुलाती है
वो माँ कहलाती है ।

जाते हुये बलायें लेती
रो पड़ती तुम्हारे लिए
जाना तुम्हे होता है
जान उसकी जाती है
वो माँ कहलाती है ।

भागती जिंदगी में कदम तुम्हारे
बढ़ते चले जाते हैं
और थक जाते हो जब कभी
तो याद फिर आती है !
याद ! जो ठहरना सिखाती है
वो माँ कहलाती है ।

एक खांसी पर तुम्हारी
वो सर पे उठा लेती है आसमां
और वक़्त आने पर
लड़ भी लेती है वक़्त से
तुम्हारे लिए !
तुम्हे जिंदगी दे जाती है
वो माँ कहलाती है ।

तवे से उतार के रोटी में
प्यार गूंथकर देती है
तुम कुछ खा के
कुछ बचा के
खेलने चले जाते हो
फिर वो बासी रोटी
जिसके काम आती है
वो माँ कहलाती है ।

कभी कभी डांट कर तुम्हे
किचन के उस कोने में
चुपके चुपके रोती है
डांटना पड़ता है उसे
तुमको इंसान बनती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारे वादों पर हंसती
जो तुम तोड़ देते हो नयी सुबह
जिंदगी की हर सांझ में
अपना वादा निभाती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारी फ़िक्र में सूखती है
झुर्रियों के बीच कहीं
अपना ध्यान कहाँ उसे ?
अपनी फिक्र कहाँ  कर पाती है !
वो माँ कहलाती है ।

तुम बड़े हो जाते हो जल्दी !
ऊँचे भी !
देख नहीं पाते पीछे !
और नीचे भी !
वो बस आंसुओं में
घिरी रह जाती है ।
वो माँ कहलाती है ।

तुम उसका जीवन होते हो
वो तुम्हारा पुराना पंखा !
आवाज करती है न ?
पसंद नहीं आती !
याद करो कभी तुम्हारे रोने में !
तुम्हारी जिद में !
एक मतलब ढूंढ लेती थी !
आज भी कोशिश करती
पर तुम बड़े हो गए हो
बेचारी समझ नहीं पाती है
वो माँ कहलाती है ।





Saturday, October 3, 2015

नूर















वजह नहीं है आपसे वफ़ा करने की कोई
पर आप जैसा कभी कोई मिला नहीं है ।

मोहब्बत से महरूम था ताउम्र धड़कता दिल मेरा
दिल से पूछो ज़रा, इसको कोई गिला नहीं है ।

आपके झूले की डाली देखो बेरंग सी हो गयी
कोई पत्ता हिला नहीं है , कोई फूल खिला नहीं है ।

आपके नूर की बारिश को , कैद कर सके दीवारों में
ऐसी कोई जगह नहीं है , ऐसा कोई किला नहीं है ।

आपकी याद की पनाह में , आबाद है जिंदगी मेरी
मुलाकातों का अभी तक, कोई सिलसिला नहीं है ।

एक बार चाँद को , देख कर खिलखिला दिये
वो आज तक अहले वफ़ा , आसमां से हिला नहीं है ।





मौजूं















मेरी साँसों को घोल के गिलास के मौजूं में
आज उसने नयी नयी सी शराब बनायी है ।

नए इश्क़ का मौसम है जवां जवां
कुछ बदली बदली सी वो भी नजर आई है ।

मुझसे बिछड़ के आईने में इतराते हैं तेवर
ये कैसी मोहब्बत थी ! ये कैसी जुदाई है !

 मोहब्बत में तो फ़ना होने का उसूल मुनासिब है
गलत वो समझ बैठे , सजा हमने पायी है ।


मेरी मौत पर जश्न का इंतजाम करो यारो
जाम उठाओ की आज मेरी रूह की रिहाई है ।

मेरे क़त्ल का इल्जाम मेरी ही बेवफाई के सर है
उसने बड़ी शिद्दत से अपनी वफ़ा निभायी है ।

उसके आशिकों को देखो आज कफ़न काम पड़ गए
वो खुदा थी इनकी , ये उसकी खुदाई है ।

मेरे जिस्म पर कफ़न चढाने का बहाना ये नया है
फिर क़त्ल करने खंजर नया, बड़ी दूर से वो लायी है ।