Monday, January 16, 2017

सभ्यता और समय 















समय की चाल पर खेलता
खंडहरों का हुजूम
और खंडहर हो जाता है
देखता अगर खुद को आईने में
बेसबर हो जाता है !

अंतहीन जीवन की कल्पना
स्वयंभू का अस्तित्व खोजता
मानव गढ़ता है राजमहल
होती है चहल पहल
चंद पलों की ...
और पल अगला निगल जाता है
पुराने पल को !
ठिठकती सभ्यतायें देखती
इस सतत छल को !

अदना सा मानव देखता
खुद को विजयी होते
सागर , पर्वत , व्योम
कितने छोटे लगते !
लेकिन भान नहीं है
धरती के गर्भ का ?
या फिर भान अधिक है
स्वयं के दर्प का ?
लावा निकलता कभी गर्भ से
कभी अपने अंदर छुपे दर्प से
और लुहलुहान होकर आखिर
बदल जाती है सभ्यता !
जिसे देखने आती नयी सभ्यता
अपना नया दर्प लेके !

ये पहिया चलता जाता है
घूम कर फिर वहीँ वहीँ आता है
बीच में कुछ अस्तित्वहीन धूलि कण
कर देते हैं अपने काल्पनिक युग का निर्माण
जिसे अगले चक्र में पहिये के नीचे आना है
जिसे अपना वजूद खुद ही मिटाना है !!


Sunday, May 15, 2016

शिक्षक शिक्षकों से ....


मैं शिक्षक हूँ मैं शिक्षा की कुछ बात बताने आया हूँ
मैं अध्यापक का नया नवेला अर्थ सुनाने आया हूँ ।

मेरी छोटी सी विनती है कि शिक्षा को समझे बुझेँ
मेरा अपना जो अनुभव है , मैं उसे साथ में लाया हूँ ।

शिक्षा क्या है ?
चंद किताबें !
जिनमे बस कुछ अक्षर होते
और कुछ मनमानी सी बातें ?
यही अगर बस शिक्षा है तो
शिक्षक का कोई मोल नहीं
उसकी अपनी कोई सोच नहीं
उसके अपने कोई बोल नहीं !

शिक्षा का बस मर्म यही है
सही गलत का भेद सिखाओ
रोबोट किताबी नहीं चाहिये
एक अच्छा इंसान बनाओ ।

कौतुहल है बच्चों में तो
तुम सबसे अच्छे अध्यापक हो
प्रश्न वहाँ से जितने आयें
उतना तुम मुस्काते जाओ
क्यूंकि कौतूहल में ही तो
नये विश्व का राज छुपा है
बच्चों की विस्मित आँखों में
ऊँचा उड़ता सा बाज़ छुपा है ।

उस बाज़ को हमें उड़ाना है
उसके पंखो की ताकत से
आसमान ये संवरेगा
उसकी आँखों की ताकत से
आसमान ये देखेगा ..
एक नया जमाना
नया तराना
दुनिया का
जिसके निर्माता शिक्षक हैं ।

शिक्षक जब शिक्षक न होकर
दोस्त बने इन बच्चों के
तो समझूंगा कि तुमने
शिक्षा को पूरा समझा है
और पूरा ही समझाया है
इन प्यारे प्यारे बच्चों को ।

और केवल बस पढ़ाते रहना
नहीं है पूरा  काम हमारा
प्रश्न पूछना अपने से   ...
हम कितना सीखे हैं हर दिन
कितना और सीखना है ?
कितनी मेहनत करनी है ?
कितना और सींचना है ?
तब जाके इन प्यारे पौधों
को पानी दे पाओगे
इन्हे सींचकर अपने श्रम से
हरा भरा कर पाओगे
नहीं तो फिर ये सूखेंगे
और तुम भी मुरझाओगे ।

शिक्षक ऐसा दर्पण है
जिसमे अपने चेहरा देखें
बच्चे हरपल हँसते हँसते
जैसा दर्पण वैसा चेहरा
जैसी चालें वैसा मोहरा
मोहरों को हर मुश्किल में
लड़ते रहना सिखलाना है
खुद ही बन के नयी प्रेरणा
बच्चों को दिखलाना है
तभी तो कुछ दे पाओगे
अपने में से बच्चों को
तभी तो कुछ कह पाओगे
इन सब मन के सच्चों को ।

ये माटी जैसे कच्ची कच्ची
ज्यूँ ढालोगे ढल जाएंगे
तुम बस थोड़ा हाथ लगाओ
नये नये बन जाएंगे
और जो तुम इनसे भागोगे
तो शिक्षा का क्या अर्थ रहा ?
ये शिक्षा केवल शब्द नहीं है
एक पूरा आंदोलन है

तुम गांधी हो आंदोलन के
तुम्हे आज़ादी अब लानी है
एक ऐसी फ़ौज बनानी है
जो सत्य अहिंसा के रस्ते में
चलके अपनी मंजिल पाये
रामानुजम के साथ चले
और रमन से हाथ मिलाएं
ग़ालिब से अल्फाज़ लिखें
विश्वेसरैया का मान बढ़ायें

तभी गर्व से कह सकते हो
शिक्षक हूँ मैं शिक्षक हूँ
कर्मो का और मूल्यों का
मैं इकलौता रक्षक हूँ ।

तुम गर ये कर सको तो
मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगा
शिक्षक था मैं शिक्षक हूँ मैं
गर्व से अपने बाद कहूंगा ।

Sunday, May 8, 2016

माँ




एक चाबी जैसे गुड्डे की तरह
बेफिक्र हो लगातार हर पल
जो चलती चली जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जो घर में मिठाई आती है
तो उसका क पेट भरा होता है
क्यूंकि बच्चे का मन हरा होता है
और उसको खिलाते वो मिठाई
अपनी आँखों से खाती है
वो माँ कहलाती है ।

ओढ़कर जब तुम चादर कहीं
सपनो में जी रहे होते हो
जो बुनकर एक कंबल नया
तुमको चुपके से ओढ़ा जाती है
वो माँ कहलाती है ।

जिस स्वेटर को समझकर पुरानी
फेंक देते हो नयी चीजों के लिए
उसके रेशों में भर प्यार का शहद
एक नयी चाशनी बनती है
वो माँ कहलाती है ।

थक कर कभी जब सोती है
तुम्हारे जगने की रात होती है
कैसे नींद आये उसे !
थपकियों से कहानियो से
कोशिश करती
अपनी नींद भूल कर !
तुमको फिर जो सुलाती है
वो माँ कहलाती है ।

जाते हुये बलायें लेती
रो पड़ती तुम्हारे लिए
जाना तुम्हे होता है
जान उसकी जाती है
वो माँ कहलाती है ।

भागती जिंदगी में कदम तुम्हारे
बढ़ते चले जाते हैं
और थक जाते हो जब कभी
तो याद फिर आती है !
याद ! जो ठहरना सिखाती है
वो माँ कहलाती है ।

एक खांसी पर तुम्हारी
वो सर पे उठा लेती है आसमां
और वक़्त आने पर
लड़ भी लेती है वक़्त से
तुम्हारे लिए !
तुम्हे जिंदगी दे जाती है
वो माँ कहलाती है ।

तवे से उतार के रोटी में
प्यार गूंथकर देती है
तुम कुछ खा के
कुछ बचा के
खेलने चले जाते हो
फिर वो बासी रोटी
जिसके काम आती है
वो माँ कहलाती है ।

कभी कभी डांट कर तुम्हे
किचन के उस कोने में
चुपके चुपके रोती है
डांटना पड़ता है उसे
तुमको इंसान बनती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारे वादों पर हंसती
जो तुम तोड़ देते हो नयी सुबह
जिंदगी की हर सांझ में
अपना वादा निभाती है
वो माँ कहलाती है ।

तुम्हारी फ़िक्र में सूखती है
झुर्रियों के बीच कहीं
अपना ध्यान कहाँ उसे ?
अपनी फिक्र कहाँ  कर पाती है !
वो माँ कहलाती है ।

तुम बड़े हो जाते हो जल्दी !
ऊँचे भी !
देख नहीं पाते पीछे !
और नीचे भी !
वो बस आंसुओं में
घिरी रह जाती है ।
वो माँ कहलाती है ।

तुम उसका जीवन होते हो
वो तुम्हारा पुराना पंखा !
आवाज करती है न ?
पसंद नहीं आती !
याद करो कभी तुम्हारे रोने में !
तुम्हारी जिद में !
एक मतलब ढूंढ लेती थी !
आज भी कोशिश करती
पर तुम बड़े हो गए हो
बेचारी समझ नहीं पाती है
वो माँ कहलाती है ।





Saturday, October 3, 2015

नूर















वजह नहीं है आपसे वफ़ा करने की कोई
पर आप जैसा कभी कोई मिला नहीं है ।

मोहब्बत से महरूम था ताउम्र धड़कता दिल मेरा
दिल से पूछो ज़रा, इसको कोई गिला नहीं है ।

आपके झूले की डाली देखो बेरंग सी हो गयी
कोई पत्ता हिला नहीं है , कोई फूल खिला नहीं है ।

आपके नूर की बारिश को , कैद कर सके दीवारों में
ऐसी कोई जगह नहीं है , ऐसा कोई किला नहीं है ।

आपकी याद की पनाह में , आबाद है जिंदगी मेरी
मुलाकातों का अभी तक, कोई सिलसिला नहीं है ।

एक बार चाँद को , देख कर खिलखिला दिये
वो आज तक अहले वफ़ा , आसमां से हिला नहीं है ।





मौजूं















मेरी साँसों को घोल के गिलास के मौजूं में
आज उसने नयी नयी सी शराब बनायी है ।

नए इश्क़ का मौसम है जवां जवां
कुछ बदली बदली सी वो भी नजर आई है ।

मुझसे बिछड़ के आईने में इतराते हैं तेवर
ये कैसी मोहब्बत थी ! ये कैसी जुदाई है !

 मोहब्बत में तो फ़ना होने का उसूल मुनासिब है
गलत वो समझ बैठे , सजा हमने पायी है ।


मेरी मौत पर जश्न का इंतजाम करो यारो
जाम उठाओ की आज मेरी रूह की रिहाई है ।

मेरे क़त्ल का इल्जाम मेरी ही बेवफाई के सर है
उसने बड़ी शिद्दत से अपनी वफ़ा निभायी है ।

उसके आशिकों को देखो आज कफ़न काम पड़ गए
वो खुदा थी इनकी , ये उसकी खुदाई है ।

मेरे जिस्म पर कफ़न चढाने का बहाना ये नया है
फिर क़त्ल करने खंजर नया, बड़ी दूर से वो लायी है ।

Friday, October 2, 2015

रंग


मैंने तुम्हारे अस्तित्व में छुपी
अपनी सम्भावनायें तलाशी है
और समझा है स्वयं को
तुममें छनते हुए धीरे धीरे ।

बारीक रेशे की तरह रुई के फाहों में
गुन कर तुमने एक धागा बनाया है
फिर कभी ओढ़ लिया होगा इसे बेफिक्र सा
तभी तो तुम्हारा ही रंग नजर आया है ।

मेरी साँसों में धीरे से घुलता नशा
प्रतिबिम्ब है तुम्हारी याद का
मदहोश होती आत्मा डुबकी लगाती
एक निशान बच गया है साथ का ।

निशान …
जिसके सहारे मुझे जिंदगी चलानी है
वैसे ! जैसे बगैर पहिये के गाडी
इस खेल में तुम ही थे अनाड़ी !
इस खेल में तुम ही थे खिलाड़ी !
और मैं तो वैसे भी नहीं हूँ अब
शरीर यहाँ बाकी कहीं कहीं हूँ अब !
तो बताओ मुझे मुझको लौटाओगे ?
या कोई और रंग चढ़ाओगे !

Saturday, April 25, 2015

कागज़ का टुकड़ा

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कागज के टुकड़ों में दौड़ती जिंदगी उसकी
पता नहीं वापिस कब मिलेगी !
खो गयी है आश्वासनों के समुन्दर में
उड़ गयी है सत्ता के बवंडर में
एक फ़ाइल को ताकती पथरायी नजरें
कि उसकी बिजली कब लगेगी !

नाले को ही सांस बना चुका वो
जहर को पानी बना के पीने लगा है
कुछ सपने अपने कुछ पराये हुक्मरानो के
अब अगले साल में जिंदगी जीने लगा है !
कागज़ की कश्ती बनाता , चलाता
वो कागज के कुछ टुकड़े सीने लगा है ।


सड़कों पर काँप कर चलती इज्जत
हर आहट से घबरा सहम जाती है
क्या पता उसको अखबार का कोना न मिले कोई
ये जिंदगी हर बार कहाँ रहम खाती है !
कागज़ के टुकड़ों में वो केस ही नहीं बनता
जहाँ एक और निर्भया चली आती है ।


मौत से पहले जीने की कवायद में
कुछ कागज़ के टुकड़ो के लिए …
कागज के टुकड़े चाहिए
और उन कागज़ के टुकड़ों के लिए
एक और कागज़ का टुकड़ा चाहिए !

ये सर्कस है बाबू ! ऐसे ही चलता है
यहाँ कागज़ का टुकड़ा
बड़ी मुश्किल से मिलता है ।
और मिलने के बाद भी एक और ठप्पा चाहिए !
तभी तो भाई
कागज का टुकड़ा चलता है ।