Friday, May 31, 2013

खलबली

क्यूँ आज मचलता हिलोरों में दिल मेरा 
की लहर एक खेलती है मनचली सी 

भिगोती फिर वही बारिश की वो अदा 
अलसाई आँखे जैसे तेरी अधखुली सी 

रंग उड़ते हर तरफ सरोबार मैं होता मगर ..
डरता कहीं न सिमटे वो, खिली नन्ही कली सी । 

आज बस नहीं चल रहा , मैं बिन पिए मदहोश हूँ 
नैनो की साजिश है ये ढूंढते ,फिर वही गली सी 

झूमता मैं हूँ या समां ये पागलपन में !
फिजा गुलाबी है , हवा है संदली सी । 

तूफान अन्दर है बाहर भी, जाने कैसा निरीव सा 
उसके मन में भी काश हो ! थोड़ी बहुत खलबली सी !

सब्जी की दुकान

चांदनी सी बिखर गयी थी 
आज जो तुम आई थी 
पुरानी सब्जी की दुकान पर 
टूटे खंडहर से मकान पर 
मैं तो बस यूँ ही मस्ती में 
घूम रहा था ..
देख रहा था चाँद को भागते हुए 
साथ बादलों के झूम रहा था 
क्या पता था की जमीं पर चाँद आएगा 
रोशनी में जिसकी दिल 
ऐसे ही ठिठक जाएगा !
गुपचुप सा डरा हुआ ये दिल 
देख रहा था तुमको 
कनखियों से !
नजरे मिलाने की हिम्मत न थी 
कुछ बोल पाने की किस्मत न थी 
टमाटर सुर्ख लाल दिख रहे थे ..
तुम्हारे अक्स में सरोबार हो 
और मैं बार बार पगला उन्ही को बटोर रहा था !
की जैसे वो तुम ही हो ..
आवाज सुनने के लिए इंतज़ार में ..
बैठा भी रहा था ..
झिड़क सुनता सब्जी वाले की । 
और तुम्हारी मुस्कान ने जैसे 
समझ लिया था मुझे ..
बात भी कर ली थी 
सादगी से चुपचाप । 
और फिर चल पड़ी थी तुम 
उसी नजाकत से रास्ते पर 
और मैं वापिस खो गया सब्जियों के जहां में 
जहाँ अभी भी तुम्हारी खुशबू मौजूद थी ।