Tuesday, August 19, 2008

निनाद

निनाद की है धुन बजी
और देखो कैसे प्रकृति सजी ..
नगर नगर डगर डगर ..
शहर शहर पहर पहर ...
हो रहा है नाद ..
तर्कशास्त्र-विवाद...
इसका कि कैसे सजायें ..
कैसे मनाएं ..
कैसे बताएं ..
कि दिवस है ख़ास
लोगों का विश्वास ..
पूर्ण आभास
कुछ तो बताओ ?
कौन सा चेहरा ..
आज है गहरा ...
मन की दुदुम्भी
विनम्रता का अँधेरा ..
किसका है पहरा ?
हे मन ..जान तू
पहचान तू ..
सृष्टि का फली
वरदान तू ..
आज है जन्मदिवस ...
निनाद - धरा से अंचल ..
कर रहे करतल ...
मुस्कुराते वसंत ..
चलता रहे ..
खुशियों का तराना
जीवन पर्यंत |

1 comment:

Anand Shankar said...

ahaaa .. kya flow hai ! [:)]