Saturday, April 25, 2015

कागज़ का टुकड़ा

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कागज के टुकड़ों में दौड़ती जिंदगी उसकी
पता नहीं वापिस कब मिलेगी !
खो गयी है आश्वासनों के समुन्दर में
उड़ गयी है सत्ता के बवंडर में
एक फ़ाइल को ताकती पथरायी नजरें
कि उसकी बिजली कब लगेगी !

नाले को ही सांस बना चुका वो
जहर को पानी बना के पीने लगा है
कुछ सपने अपने कुछ पराये हुक्मरानो के
अब अगले साल में जिंदगी जीने लगा है !
कागज़ की कश्ती बनाता , चलाता
वो कागज के कुछ टुकड़े सीने लगा है ।


सड़कों पर काँप कर चलती इज्जत
हर आहट से घबरा सहम जाती है
क्या पता उसको अखबार का कोना न मिले कोई
ये जिंदगी हर बार कहाँ रहम खाती है !
कागज़ के टुकड़ों में वो केस ही नहीं बनता
जहाँ एक और निर्भया चली आती है ।


मौत से पहले जीने की कवायद में
कुछ कागज़ के टुकड़ो के लिए …
कागज के टुकड़े चाहिए
और उन कागज़ के टुकड़ों के लिए
एक और कागज़ का टुकड़ा चाहिए !

ये सर्कस है बाबू ! ऐसे ही चलता है
यहाँ कागज़ का टुकड़ा
बड़ी मुश्किल से मिलता है ।
और मिलने के बाद भी एक और ठप्पा चाहिए !
तभी तो भाई
कागज का टुकड़ा चलता है । 

3 comments:

Harish Chandra said...

Nice one.

naveen khandelwal said...

wah chilu bhai...kha ho aajkal..

Naveen Khandelwal (Ethics ki class me sath the)

Nitin said...

Good one :)