Sunday, September 14, 2008

निहारिका

निहारिकाओं का अद्भुत संगम ...
कहीं दूर गोचर हुआ ...
फूटी एक अद्भुत किरण ..
धन्य वो अम्बर हुआ !

टिमटिमा कर उसने कहा ..
रोशनी को भर लो वहाँ ...
चाँदनी को ख़ुद में समेटे ..
मयूर नाच रहा है जहाँ !

कोयल के गले से आगे ..
निकली वो तान कहीं जा के ..
छू गई अंतर्मन को एसे ..
चकोर जैसे चांदनी में जागे !

फ़िर चाँद भी शरमाकर बोला ...
प्रेम पुलिंदों का बाँध एक खोला ..
बस एक आरजू मन में लिए ...
कितना निश्छल कितना भोला !

तारों की भी बारी आई ...
कितने नेत्रों को साथ में लायी ...
निहारते रह गई निहारिका वो ..
पलकें झुका कर लजाई !

अब सूर्य आ गया था ...
लाल वर्ण छा गया था ...
निहारिका की हामी को ...
लालिमा से सजा गया था !

फ़िर भी चाँद, तारे और चातक ...
लिए जिनके रात प्यारी दिन घातक ..
मन में एक सपना लिए ...
इन्तजार कर रहे हैं..
पल पल मर रहे हैं !!!

फ़िर भी कहते हैं वो हंसकर ..
हे निहारिका ! बधाई हो ...
हम अभागों के घाव न गिन ...
तुझे मुबारक तेरा जन्मदिन !!!

1 comment:

@mit said...

simply GOD level !!